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दिल्ली में कामयाबी प्रदेश में नाकाम, पचौरी-कमलनाथ की राजनीति मध्य प्रदेश आने पर भंवर में फंसी
मध्य प्रदेश कांग्रेस के दो राजनीतिक धुरंधर कमलनाथ और सुरेश पचौरी की दिल्ली में राजनीति जिस कामयाबी के शिखर पर थी, वह मध्य प्रदेश में आने के बाद भंवर में फंस गई। पचौरी जहां अब बैठकों में एकतरफ कुर्सी में बैठे नजर आते हैं तो कमलनाथ इंदिरा गांधी के तीसरे पुत्र कहलाने के बाद भी मध्य प्रदेश राजनीति में छह साल में भंवर में फंस चुके हैं। पढ़िये रिपोर्ट।
कांग्रेस में मध्य प्रदेश से दिल्ली की राजनीति करने वाले नेताओं में चार दशकों में कमलनाथ, सुरेश पचौरी, स्व. अर्जुन सिंह, स्व. माधवराव सिंधिया, दिग्विजय सिंह शामिल रहे हैं लेकिन इनमें से कमलनाथ-पचौरी दो ऐसे नेता रहे हैं जो हाईकमान के बेहद करीबी माने जाते थे। अर्जुन सिंह व सिंधिया ने तो कांग्रेस छोड़कर पार्टी में वापसी की थी जिससे कमलनाथ-पचौरी वहां कांग्रेस के बड़े नेताओं में शुमार रहे। इन दोनों नेताओं का दिल्ली में कांग्रेस में बड़ा रुतबा रहा और संगठन से लेकर सरकारों तक में उन्हें अहम भूमिकाएं मिलती रहीं।
पचौरी एमपी में आने के बाद दिल्ली के नहीं रहे
मध्य प्रदेश में दिग्विजय सरकार की हार के पांच साल बाद कांग्रेस की सरकार में वापसी के लिए पचौरी को मध्य प्रदेश की राजनीति में भेजा गया और उन्हें यहां प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। मगर टिकट वितरण में उनके-अपने का फार्मूला चला और ज्यादा से ज्यादा अपनों को टिकट देकर सीएम की कुर्सी पर नजर रखने की रणनीति ने दिल्ली की राजनीति के कामयाब नेता को मध्य प्रदेश में नाकाम साबित होना पड़ा। इसके बाद वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाए गए तो न दिल्ली की राजनीति में उनका वो दम-खम रहा और प्रदेश में तो वे कमजोर हो ही गए थे।
कमलनाथ को प्रदेश की राजनीति में हाईकमान ने खूब छूट दी
प्रदेश में लगातार तीन बार कांग्रेस की सरकार नहीं बन पाने पर पीसीसी की आर्थिक रूप से कमर टूट चुकी थी जिससे कांग्रेस के कुबेरों में शामिल कमलनाथ को मध्य प्रदेश की राजनीति में उनकी शर्तों पर भेजा गया। ज्योतिरादित्य सिंधिया को राहुल-प्रियंका गांधी के करीबी होने के बाद भी मध्य प्रदेश की कांग्रेस की राजनीति में विशेष दखलदांजी नहीं चल सकी। सरकार बन गई और कमलनाथ-दिग्विजय सिंह ने मिलकर सिंधिया के साथ लोकसभा चुनाव व उसके बाद ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दीं कि उन्होंने पार्टी छोड़ने का फैसला कर कांग्रेस की 15 साल बाद आई सरकार को गिराने में भाजपा का साथ दिया। सरकार गिरने से रोकने के लिए कमलनाथ ने विशेष प्रयास नहीं किए और उसके बाद उपचुनावों में सिंधिया व उऩके समर्थक मंत्रियों पर पैसे लेकर दलबदल करने के आरोपों को जनता ने नकार दिया। पांच साल तक उन्हें संगठन बनाकर विधानसभा उपचुनाव 2023 की तैयारी का पूरा मौका मिला। हाईकमान ने उनके चाहने पर प्रदेश अध्यक्ष व नेता प्रतिपक्ष के दोनों पद काफी समय तक उन्हें देकर रखे। विधानसभा चुनाव 2023 में मुख्यमंत्री चेहरा घोषित नहीं करने की हाईकमान की लाइन के विपरीत भावी मुख्यमंत्री के नारों के साथ उन्होंने चुनाव लड़ा। जब चुनाव में हार हो गई तो उन्होंने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा नहीं दिया जिससे उन्हें हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर हारे हुए पूर्व मंत्री जीतू पटवारी को पीसीसी की कमान सौंप दी। छह साल में कमलनाथ दिल्ली के कामयाब नेता से मध्य प्रदेश की राजनीति के फ्लॉप नेता बन गए।




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