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मध्य प्रदेश कांग्रेस की छह साल की गलतियां, संगठन-सर्वे के नाम पर कार्यकर्ताओं पर चला डंडा
मध्य प्रदेश कांग्रेस में 2018 के विधानसभा चुनाव के छह महीने पहले मई में अरुण यादव को हटाकर कमलनाथ को कमान सौंपी गई थी। 15 साल से राज्य में सत्ता से बाहर पार्टी का खजाना खाली था और उसके लिए कमलनाथ को जिम्मेदारी दी गई थी जिसके लिए उन्होंने संगठन खड़ा करने और चुनाव के लिए सर्वे के नाम पर कार्यकर्ताओं पर चलो-चलो का डंडा चलाया था। चंद नेताओं से संवाद करके प्रदेश में पार्टी चलाने की उनकी रणनीति में न संगठन बचास न ही जमीनस्तर पर प्रत्याशी चयन के लिए सर्वे हुआ जिसका नतीजा 2023 में कांग्रेस 2003 की स्थिति में आकर खड़ी हो गई है। पढ़िये मध्य प्रदेश में कांग्रेस के डेढ़ दशक के संगठन पर रिपोर्ट।
विधानसभा चुनाव के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस में अब बुजुर्ग नेताओं के दिनों भूलेबिसरे होने वाले हैं और उन दिनों को याद कर पार्टी के नेता गलतियों को याद कर रह रहे हैं। 2003 में जब कांग्रेस की दिग्विजय सरकार को उमा भारती सरकार ने विदा किया था, तब से आज तक के पीसीसी संगठन के कामकाज की समीक्षा नेताओं द्वारा की जा रही है। सुभाष यादव को छोड़कर हर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की आलोचना की जा रही है। सुरेश पचौरी के नेतृत्व में जब 2008 में विधानसभा चुनाव हुआ था तब टिकट वितरण की गलतियां गिनाई जा रही हैं तो उनके बाद कमान संभालने वाले कांतिलाल भूरिया को संगठन को नहीं संभाल पाने का दोषी करार दिया जा रहा है। उनके बाद 2013 विधानसभा चुनाव की हार के बाद लाए गए अरुण यादव को संगठन में कुछ नेताओं से घिर जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि उनके तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के साथ अच्छा तालमेल होने से 2017-18 में प्रदेश में कांग्रेस की गतिविधियों में तेजी आई। मगर चुनाव के ठीक पहले उन्हें हटाकर कमलनाथ को लाया गया और यादव-अजय सिंह के बनाए गए माहौल व तत्कालीन प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया द्वारा तैयार संगठन मंडलम-सेक्टर के सहारे पार्टी को सरकार में आने लायक सीटें मिलीं।
कमलनाथ के कार्यकाल में कार्यकारिणी की बैठक नहीं
मध्य प्रदेश कांग्रेस में कमलनाथ के कमान संभालने के बाद कार्यकारिणी की एक भी बैठक नहीं हो सकी जबकि साल में हर तीन महीने में कार्यकारिणी की बैठक का नियम है। इसकी वजह यह मानी जा रही है कि कार्यकारिणी में कितने महासचिव, सचिव हैं, यह सही तौर पर रिकॉर्ड पीसीसी में उपलब्ध नहीं है। जिन पदों की नियुक्ति अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा की जाती है, वह मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के संगठन प्रभारी या प्रशासन प्रभारी महामंत्री के हस्ताक्षर से की जाती रही। चुनावों के दौरान टिकट से वंचित नेताओं की संतुष्टि के लिए बेहिसाब नियुक्तियां की जाती रहीं और यह सिलसिला 2018 के विधानसभा चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव 2019, नगरीय निकाय चुनाव, विधानसभा चुनाव 2023 के टिकट वितरण के दौरान तक चला। इस बंदरबाट में सैकड़ों की संख्या में उपाध्यक्ष, महासचिव, सचिव बन गए।
प्रत्याशी चयन से खुली सर्वे की पोल
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया में सालभर पहले नेताओं और दावेदारों को सर्वे के नाम पर बहलाया जाता रहा लेकिन जब प्रत्याशियों का ऐलान हुआ तो उसकी पोल खुल गई। पांच साल या उससे ज्यादा समय से चुनावी हार वाली 66 सीटों पर जो प्रत्याशी दिए गए उनमें से 59 की एकबार फिर हार हुई जिनमें से ज्यादातर प्रत्याशी पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के समर्थक या उनके सुझाए गए नेता थे। भोपाल की गोविंदपुरा-हुजूर विधानसभा सीटों पर तो ऐतिहासिक मतों से पार्टी प्रत्याशियों की हार हुई। दिग्विजय सिंह के परिवार व रिश्तेदारों को सात टिकट दिए गए थे जिनमें से केवल उनके पुत्र जयवर्धन सिंह ही जीत पाए। रीवा में 1000 से भी कम मतों से जीत हासिल करने वाले निष्ठा बदलने वाले नेता अभय मिश्रा को जिले संगठन के विरोध के बावजूद टिकट दे दिया गया तो एक सीट पर कांग्रेस नेताओं की हत्या के आरोपों में घिरे नेता को पार्टी ने टिकट दे दिया। सर्वे की जमीनी हकीकत इससे भी पता चलती है कि टिकट वितरण के बाद प्रत्याशियों को बदला गया।




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