जनता के विश्वास की रक्षा करना हमारा सर्वोच्च दायित्व है। यह विश्वास ही हमारी शक्ति है और यही हमारी जिम्मेदारी भी। विधायिका के सदस्यों का आचरण, सदन के भीतर और बाहर दोनों ही स्थानों पर, लोकतंत्र की साख से जुड़ा होता है। आज यह आवश्यक है कि हम केवल सिद्धांतों पर चर्चा न करें, बल्कि व्यवहार में भी जवाबदेही को और सुदृढ़ करने के उपायों पर विचार करें। जब एक जनप्रतिनिधि जनता के हित की बात करता है तो लोकतंत्र मजबूत होता है। हमें सोचना होगा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाले तत्वों का विधायिका कैसे पालन करे और पालन करवाए। हमारी शक्ति विधायकों सहित लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाले तत्वों के संरक्षण में लगनी चाहिए।
यह बात मध्यप्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने लखनऊ में आयोजित 86 वें पीठासीन अधिकारी सम्मलेन में कही। आयोजन में लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला सहित विभिन्य राज्यों की विधानसभाओं के अध्यक्ष, प्रमुख सचिव, सचिव एवं उत्तरप्रदेश विधानसभा के अधिकारी उपस्थित थे। ‘जनता के प्रति विधायिका की जवाबदेही’ विषय पर बोलते हुए मप्र विधानसभा के अध्यक्ष श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने विधायिका के दायित्वों, उनकी चुनौतियों और समाधान पर विस्तृत विचार रखे। श्री तोमर ने कहा कि भारत की शासन व्यवस्था में सत्ता का जनता के प्रति उत्तरदायी होना वैदिक काल से है। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभुश्री रामचंद्र जी के द्वारा स्थापित “राम राज्य” वस्तुतः जनोन्मुखी शासन प्रणाली ही है। सम्राट विक्रमादित्य और सम्राट अशोक जैसे कई राजा हुए जिनका शासन जन कल्याण के लिए सदैव उदाहरण के रूप में उल्लेखित किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा संविधान में निहित है और संविधान की जीवनरेखा विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन में है। इनमें विधायिका को यह विशिष्ट स्थान प्राप्त है कि वह सीधे जनता के मत से निर्मित होती है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका जनाधार होता है और उस जनाधार का सबसे सशक्त संवैधानिक मंच विधायिका है। आज के समय में जवाबदेही की परिभाषा और भी व्यापक हो गई है। सूचना का अधिकार, डिजिटल माध्यम, सोशल मीडिया और जागरूक नागरिक समाज ने विधायिका के समक्ष नई चुनौतियाँ और नए अवसर दोनों प्रस्तुत किए हैं। जनता अब केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि निरंतर अपने प्रतिनिधियों के कार्यों पर दृष्टि रखती है। ऐसे में विधायिका के सदस्यों का आचरण, सदन के भीतर और बाहर दोनों ही स्थानों पर, लोकतंत्र की साख से जुड़ा होता है। गरिमापूर्ण व्यवहार, मर्यादित भाषा और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान—ये सभी विधायिका की जवाबदेही के अभिन्न अंग हैं।
इस संबंध में मध्यप्रदेश विधानसभा की भूमिका का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश विधानसभा ने अपने गठन से लेकर आज तक लोकतांत्रिक मूल्यों, संसदीय परंपराओं और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता का एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत किया है। सदन की कार्यवाही को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और जनोन्मुखी बनाने के लिए समय-समय पर अनेक नवाचार किए गए हैं। विधायी समितियों की सक्रियता, प्रश्नकाल की सार्थकता, तथा सदन में रचनात्मक और विषयपरक चर्चाएँ—ये सभी जनता के प्रति जवाबदेही को मजबूत करने के प्रयास हैं। मध्यप्रदेश विधानसभा ने यह भी सिद्ध किया है कि जवाबदेही केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय के प्रति संवेदनशीलता भी इसका अनिवार्य हिस्सा है। कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, अनुसूचित वर्गों के कल्याण और क्षेत्रीय संतुलन जैसे विषयों पर सदन में हुई चर्चाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि विधायिका जनता के जीवन से जुड़े वास्तविक मुद्दों को प्राथमिकता देती है। जब सदन में किसी दूरस्थ क्षेत्र के नागरिक की समस्या उठती है और उस पर गंभीर विमर्श होता है, तब लोकतंत्र अपनी पूर्णता की ओर बढ़ता है।
श्री तोमन ने कहा कि विधायिका की जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वह कार्यपालिका पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करे। प्रश्न पूछना, नीतियों की समीक्षा करना, सार्वजनिक व्यय पर निगरानी रखना और प्रशासनिक निर्णयों पर चर्चा करना—ये सभी विधायिका के वे दायित्व हैं, जिनके माध्यम से जनता के हितों की रक्षा होती है। यदि विधायिका सजग, सक्रिय और निष्पक्ष है, तो प्रशासन भी अधिक उत्तरदायी और पारदर्शी बनता है। विधायिका की जवाबदेही का एक अन्य महत्वपूर्ण आयाम आंतरिक अनुशासन और आत्मसंयम बताते हुए उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन हमें यह अवसर प्रदान करता है कि हम अपने कार्य, आचरण और निर्णयों को जनता की कसौटी पर परखें और यह सुनिश्चित करें कि विधायिका वास्तव में जन-इच्छा की सच्ची प्रतिनिधि बनी रहे। आज जब हम इस सम्मेलन में एकत्रित हैं, तब यह आवश्यक है कि हम केवल सिद्धांतों पर चर्चा न करें, बल्कि व्यवहार में भी जवाबदेही को और सुदृढ़ करने के उपायों पर विचार करें। पीठासीन अधिकारियों की भूमिका इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे सदन के संरक्षक होते हैं, परंपराओं के संवाहक होते हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रहरी होते हैं। उनका निष्पक्ष, संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण ही सदन को दिशा देता है और जनता के विश्वास को मजबूत करता है।
इस पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में विधानसभा के प्रमुख सचिव श्री अरविंद शर्मा ने भी भाग लिया।
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