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छतरपुर में सहकारिता घोटालेः सहकारी बैंक में अवैध नियुक्तियां तो अपनों के नाम पर लाखों का लोन लेकर भूले जिम्मेदार

मध्य प्रदेश में सहकारिता में गोरखधंधा चल रहा है जिसका ताजा उदाहरण छतरपुर जिले में समितियों के कर्मचारियों को बैंक कर्मचारियों के रूप में अवैध रूप से नियुक्तियां देने और डिकोली समिति में जिम्मेदार अपनों को ही लिमिट से ज्यादा लाखों की राशि ऋण के रूप में देकर भूल गए। पढ़िये पूरी रिपोर्ट, जिसमें सरकार ने क्या एक्शन लिया और जिम्मेदार अब भी मलाई दार पदों पर कैसे जमे हैं।
मध्य प्रदेश में सहकारिता आंदोलन का ढांचा दो दशकों के दौरान तहस नहस हो चुका है और अब जो बचा है, उसे जिम्मेदार पलीता लगाने पर उतारू हैं। ताजा मामला छतरपुर जिले का है जहां जिला सहकारी बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष करुणेंद्र प्रताप सिंह, संचालक मंडल के तत्कालीन सदस्य जयकृष्ण चौबे, जीएम रामवरन पटैरिया, डीआर एसपी कौशिक ने मिलकर बैंक में नियुक्तियों का खेल किया। वहीं, दूसरे प्रकरण में डिकोली समिति के समिति प्रबंधक हरिओम अग्निहोत्री, उनकी पत्नी जिला पंचायत अध्यक्ष विद्या अग्निहोत्री ने समिति में से 2017 में अपने ही परिवार के पांच सदस्यों को निर्धारित लिमिट से ज्यादा 15-15 लाख रुपए का ऋण लेकर उसे भूल गए हैं। दोनों ही मामलों में जिनके नाम सुर्खियों में आ रहे हैं, वे जिला सहकारी बैंक अध्यक्ष पद के लिए आमने-सामने आ चुके हैं और इसमें करुणेंद्र प्रताप सिंह ने बाजी मारते हुए पद पर कब्जा कर लिया था।
अवैध नियुक्तियों में भ्रष्टाचार का खेल
जिला सहकारी बैंक छतरपुर में 37 नियुक्तियां हुई थीं जिसमें आरोप है कि सभी नियुक्तियां अवैध हैं। यह नियुक्ति समितियों के सहायक समिति प्रबंधकों को दे दी गईं जिन्हें समितियों में आठ हजार रुपए मासिक मिलते थे। बैंक की नियुक्ति के बाद उन्हें पांच गुना ज्यादा तक मासिक वेतन मिलने पर यह संदेह व्यक्त किया गया कि समितियों के सहायक प्रबंधक की नियुक्तियों के लिए जो दूसरे आवेदन पत्र लोगों ने जमा किए थे, उन्हें गायब कर दिया गया। समिति सहायक प्रबंधकों के प्रकरणों में नियुक्तियां दे दी गईं। इसमें संदेह के दायरे में बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष करुणेंद्र प्रताप व संचालक जयकृष्ण चौबे के साथ मुख्य भूमिका रामवरन पटैरिया जैसे लोगों की रही क्योंकि यह सब नियुक्ति के दौरान बैंक में मुख्य भूमिकाओं में थे। बैंक में नियुक्ति पाने वाले समिति सहायक प्रबंधकों के साथ पर्दे के पीछे लेन-देन किया गया।
सागर उपायुक्त सहकारिता कार्यालय की जांच
मामले में जब शोर-शराबा हुआ तो सागर के उपायुक्त सहकारिता कार्यालय ने चार सदस्यीय कमेटी बनाकर जांच कराई जिसके प्रमुख शिवेंद्र पांडेय और विनय प्रकाश ने सहकारी निरीक्षक आरएस गुप्ता व जीपी पिपरसानिया को छतरपुर जिला सहकारी बैंक भेजकर जांच करने भेजा। गुप्ता व पिपरसानिया ने अप्रैल के पहले सप्ताह में तीन छतरपुर में डेरा डालकर जांच की और रिपोर्ट अपने समिति प्रमुख को सौंप दी। शिवेंद्र पांडेय और विनय प्रकाश ने बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष करुणेंद्र प्रताप सिंह, संचालक जयकृष्ण चौबे को बैंक में हुई नियुक्तियों के लिए मुख्य रूप से दोषी माना और कहा कि जो नियुक्तियां की गईं वे अवैध हैं।
भोपाल से पंजीयक ने नियुक्तियों को निरस्त किया
सागर के उपायुक्त सहकारिता कार्यालय की जांच रिपोर्ट के आधार पर सहकारिता पंजीयक ने दो दिन पहले छतरपुर जिला सहकारी बैंक की सभी 37 नियुक्तियों को निरस्त करने के आदेश दिए हैं। इसमें करुणेंद्र प्रताप सिंह व जयकृष्ण चौबे के खिलाफ पंजीयक ने बैंक कर्मचारी सेवा नियम के प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं। हालांकि रामवरन पटैरिया को लेकर भोपाल से पंजीयक कार्यालय के आदेश में कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिया गया है।
दूसरा घोटाला, अपनों को लोन देकर भूलने का
छतरपुर का दूसरा सहकारिता घोटाला अपनों को ऋण देकर वापस लेना भूलने का है। कहा जा रहा है कि 2017 का यह मामला है जिसमें डिकोली समिति के समिति प्रबंधक हरिओम अग्निहोत्री और जिला पंचायत अध्यक्ष विद्या अग्निहोत्री के परिवार के पांच सदस्यों को 15-15 लाख रुपए तक का ऋण देने का है जो निर्धारित राशि से ज्यादा का था। यही नहीं इस ऋण राशि की वसूली करना ही समिति भूल गई है।
प्रतिद्वंद्वियों की लड़ाई में घोटाले उजागर
छतरपुर के सहकारिता के इन घोटालों का राज यह बताया जा रहा है कि अगर दो प्रतिद्वंद्वियों की लड़ाई नहीं होती तो यह उजागर ही नहीं होते। करुणेंद्र प्रताप सिंह भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष पुष्पेंद्र प्रताप सिंह के चाचा हैं और खुद भी भाजपा के असरदार नेता हैं तो उनके प्रतिद्वंद्वी अग्निहोत्री परिवार भी राजनीतिक प्रभाव वाला है। हरिओम तो समिति प्रबंधक हैं लेकिन वे अपनी पत्नी विद्या को सामने करके पर्दे के पीछे राजनीतिक दांवपेंच खेलते हैं। विद्या जिला पंचायत अध्यक्ष हैं। इतना सब होने के बाद भी करुणेंद्र प्रताप सिंह अभी भी कैडर समिति सदस्य हैं तो जयकृष्ण चौबे भी इसी तरह जमे हैं। नियुक्तियों में संदेह की भूमिका में रहे रामवरन पटैरिया भी नियुक्तियां अवैध पाए जाने पर मलाईदार पद पर ही हैं। वहीं, जिला सहकारी बैंक के सीईओ आरएस भदौरिया दो बड़े घोटाले उजागर होने के बाद भी अब वहीं जमे हैं और सहकारिता विभाग की ओर से उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया गया है।
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