शास्त्रीयता तक पहुँचने का रास्ता लोक से ही शुरू होता है। संगीत, नृत्य या नाट्य जैसी किसी भी
प्रदर्शनकारी कला की बात करें तो हम पाते हैं कि सबका मूलभूत आधार लोक परम्परा ही है। प्रदर्शनकारी कला के प्राचीन संस्कृत शास्त्र के रचयिता आचार्य भारतमुनि अपनी कालजयी कृति ‘नाट्यशास्त्र’ से भी इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि इस शास्त्र के बनाने का आधार लोक की गतिविधियाँ और परम्पराएँ हाई हैं।
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