साहित्य में अनुवाद परंपरा सेमीनार में वक्ताओं ने रखे विचारः संतों के दिल में सबके लिए है बराबरी

मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग के तत्त्वावधान में उर्दू एवं अन्य भाषाओं का अन्तर्सम्बन्ध के अंतर्गत “साहित्य में अनुवाद परम्परा” विषय पर आधारित सेमिनार एवं काव्यांजलि का गुरुवार, 27 नवम्बर 2025 को आयोजन किया गया। वक्ताओं ने संत कबीर, हाशिम रजा जलालपुरी की रचनाओं का पाठ किया गया। पढ़िये रिपोर्ट।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ नुसरत मेहदी ने कार्यक्रम के के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उर्दू अकादमी द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य अनुवाद की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाना और उर्दू-हिंदी के सांस्कृतिक सेतु को और मज़बूत करना है क्योंकि अनुवाद केवल शब्दों का रूपांतरण नहीं, बल्कि विचार और संस्कृति का विस्तार है। आज के दौर में ज्ञान और साहित्य की व्यापक पहुँच अनुवाद के बिना संभव नहीं। इस उद्देश्य की अहमियत समझते हुए अकादमी नए अनुवादकों की तैयारी और भाषाई संवाद को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

डॉ नुसरत मेहदी के स्वागत उद्बोधन के पश्चात कनाडा से पधारे प्रख्यात साहित्यकार एवं विद्वान डॉ. तक़ी आबिदी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में “उर्दू अनुवाद की परम्परा प्रारम्भ से आज तक” विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि उर्दू में अनुवादों को उतनी अहमियत नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए थी और इसे उर्दू में दूसरे दर्जे का साहित्य ही समझा जाता है, जबकि उर्दू भाषा अपने जन्म से ही अनुवाद की भाषा रही है। यह वो ज़बान है जो फ़ारसी, अरबी, तुर्की, संस्कृत और स्थानीय भारतीय भाषाओं के मिलन से पैदा हुई और इसी मिलन की ज़रूरत ने इसे अनुवाद का सबसे बड़ा केंद्र बना दिया। उर्दू में अनुवाद के लिए आधुनिक दौर में फोर्ट विलियम कॉलेज स्थापित हुआ जिससे कई उर्दू अनुवाद सामने आए जिनमें मीर अम्मन ने जो चार दरवेश का अनुवाद बाग़ो बहार के नाम से आया वो बहुत प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने आगे कहा कि इक्कीसवीं शताब्दी में जब दुनिया ग्लोबल विलेज बन गई है तो आज उर्दू अनुवाद के क्षेत्र में कई मसाइल का भी सामना करना पड़ता है क्यूंकि आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के कारण मशीनी अनुवाद भी होने लगा है।लेकिन मशीनी अनुवाद कभी भी इंसान द्वारा किये जाने वाले अनुवाद की जगह नहीं ले सकता क्यूंकि एक शब्द के कई अर्थ होते हैं और अनुवाद में किसी भी शब्द के सही अर्थ को जितने अच्छे ढंग से इंसान समझ सकता है, वो मशीन नहीं समझ सकती। उन्होंने ये भी कहा कि अनुवाद में जब रचनात्मकता आ जाती है तो अनुवाद सोने पर सुहागा हो जाता है ।

दिनेश मालवीय, भोपाल ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत और दुनिया के अन्य देशों में भी अनुवाद की परम्परा बहुत प्राचीन है। भारत के अनेक ग्रंथों का चीनी और अरबी में सदियों पहले हुआ। अनुवादक ज्ञानमार्ग का साधक है। एक भाषा में उपलब्ध ज्ञान को दूसरी भाषा के जरिए अन्य लोगों तक पहुंचाकर वह ज्ञान के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अनुवाद का काम बहुत कठिन होने के बावजूद बहुत आनंददायक होता है। इससे अनुवादक की सोच-समझ का दायरा बढ़ता है,जिससे वह कुएं का मेढक बनने से बच जाता है और दूसरों भी इससे बचने में मदद करता है।

वहीं स्तुति अग्रवाल ने अपना आलेख प्रस्तुत करते हुए कहा कि स्तुति अग्रवाल ने विश्व साहित्य के उर्दू अनुवादों पर चर्चा की और कहा कि उर्दू में विश्व साहित्य के बहुत बड़ी संख्या में उर्दू अनुवाद हुए हैं। यह अलग बात है कि हम उर्दू वाले अनुवाद की महत्ता को कम आंकते हैं। उन्होंने भारतीय साहित्य के उर्दू अनुवादों के बारे में भी बात की जिन्हें विश्व साहित्य में प्रमुख स्थान प्राप्त है। लेख में कबीर के दोहे, शेख़ सादी की “गुलिस्ताँ” और “बोस्ताँ”, महात्मा गांधी की आत्मकथा तथा महमूद दरवेश की शायरी का उल्लेख शामिल रहा।

इसके अतिरिक्त काव्यांजलि के अंतर्गत विशेष प्रस्तुति के तहत मजाज़ आशना, बुरहानपुर ने मेघदूत के काव्यात्मक उर्दू अनुवाद से चयनित अंश प्रस्तुत किए एवं हाशिम रज़ा जलालपुरी, रामपुर ने कबीर और मीराबाई के काव्यात्मक उर्दू अनुवाद से चयनित अंश प्रस्तुत किये। दोनों ने जो अंश पेश किए उनमें से कुछ पंक्तियाँ निम्न हैं।

मेघदूत के पूर्वमेघ से अंश
बहती हुई कुछ आगे ही क्षिप्रा नदी भी है
जिसके सबब हवाओं में इक रागिनी सी है
ठंडी महकती सीनों में ख़ुशबू बिखेरती
चारों तरफ़ फ़िज़ाओं में जादू बिखेरती
हमराह सारसों की सदाएं लिये हुए
चलती है यूँ कि जैसे शराबी कोई चले
भीगी हुई हवाएँ सज़ावार-ए-इश्क़ हैं
जो भी वहाँ में सारे गिरफ़्तार-ए-इश्क़ हैं

कबीर उर्दू शायरी में से
संतों की कोई ज़ात न कोई बरादरी
संतों के दिल में सबके लिए है बराबरी

मज़हब का कोई फ़र्क़ न क़ौमों का फ़र्क़ है
इंसानियत की राह में हर कोई ग़र्क़ है

हिंदू भी एक और मुसलमान एक हैं
इक ही ख़ुदा के बंदे हैं इंसान एक हैं
हाशिम रज़ा जलालपुरी

कार्यक्रम के अंत में डॉ. नुसरत मेहदी सभी अतिथियों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।

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