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गुलबहार सिंह द्वारा निर्देशित बाल फ़िल्म प्रदर्शन
मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में जनजातीय जीवन, देशज ज्ञान परम्परा एवं सौन्दर्यबोध पर एकाग्र पांचवे वर्षगाँठ समारोह के तीसरे दिन हुईं विभिन्न प्रस्तुतियाँ| वर्षगाँठ समारोह में आज गुलबहार सिंह द्वारा निर्देशित बाल फ़िल्म प्रदर्शन हुआ| इस फ़िल्म के केंद्र में रवि और सनी हैं| जो अपनी-अपनी क्रिकेट टीम के कप्तान हैं| रवि और सनी दोनों एक दूसरे को क्रिकेट में पराजित करना चाहते हैं और अपनी टीम को अच्छी साबित करना चाहते हैं| रवि और सनी श्रेष्ठता के लिए मैच खेलते हैं| इसी बीच पास एक व्यक्ति का एक्सीडेंट हो जाता है| अतः रवि और सनी दोनों अन्य बच्चों के साथ उस व्यक्ति की सहायता के लिए साथ दौड़ पड़ते हैं| इस फ़िल्म में बच्चों की खेल भावना और खेल के प्रति ललक को निर्देशक गुलबहार सिंह ने बड़ी ही खूबसूरती से फ़िल्म में चित्रित किया है| इस फ़िल्म की अवधि लगभग 1 घंटा 20 मिनट है| इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाओं में अमरीश पूरी, पुण्य दर्शन गुप्ता, अशोक मेहरा, संजय शर्मा और राजेश गुप्ता आदि कलाकारों ने अभिनय किया है|
गुलबहार सिंह ने हिंदी, बंगाली, अंग्रेज़ी और पंजाबी में कई लघु फ़िल्म बनाई हैं| गुलबहार सिंह को डाक्यूमेंट्री फ़िल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है| फ़िल्म के पश्चात् किस्सागोई श्रृंखला अंतर्गत श्याम मुंशी ने किस्से-कहानियों के बारे में विस्तार से बताया साथ ही किस्से-कहानियों के वर्गीकरण पर विस्तार से चर्चा की| श्याम मुंशी ने भोपाल से जुड़े कई किस्से-कहानियों को श्रोताओं से साझा किया| साथ की अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने किसकी मौत शीर्षक से एक कहानी भी श्रोताओं से साझा की|
किस्सागोई के बाद मध्यप्रदेश के भारिया जनजातीय भड़म नृत्य एवं अरुणाचल, नागालैंड और त्रिपुरा के नृत्यों की प्रस्तुतियाँ संग्रहालय के सभागार में हुईं|
मध्यप्रदेश के कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत भड़म नृत्य से की| भड़म नृत्य की शुरुआत भीम के विवाह से हुई थी और आज भी जब भारिया जनजाति में विवाह होता है तो भड़म नृत्य जरुर होता है| प्रस्तुति में कलाकारों ने 7 ढोलक, 7 टिमकी और 1 झांझ के साथ भड़म नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मोह लिया|
अरुणाचल प्रदेश से आये कलाकारों ने रिखम्पडा नृत्य प्रस्तुत कर अपनी प्रस्तुति की शुरुआत की| रिखम्पडा नृत्य निशी जनजाति द्वारा किया जाने वाला नृत्य है, यह नृत्य अरुणाचल में काफी लोकप्रिय है| जिस संगीत पर यह नृत्य किया जाता है वह पर्वत, नदियों और जंगलों से प्रेरित है| रिखम्पडा नृत्य के बाद अंत मेंअरुणाचल के कलाकारों ने बुया नृत्य प्रस्तुत किया| बुया नृत्य भी निशी जनजाति का प्रमुख नृत्य है| निशी जनजाति के लोग इस नृत्य को हर उत्सव, पर्व-त्योहार में करते हैं| मंच पर अरुणाचल प्रदेश से आये कलाकारों में पेरी एजे, हुफ्ही, तिग्दीन, कोज और रुबिन आदि सहित लगभग 22 कलाकारों ने मंच पर नृत्य प्रस्तुत किया|
नागालैंड से आये कलाकारों ने किज्युबा नृत्य से अपनी प्रस्तुति प्रारंभ की| इस नृत्य में संगतम नागा जनजाति के मछली पकड़ने और मछुआरे के जीवन को प्रस्तुत किया गया| किज्युबा नृत्य के बाद कलाकारों ने हन्तु नृत्य प्रस्तुत किया| यह नृत्य प्रायः जनजातीय महिलाओं द्वारा विभिन्न उत्सवों और पर्वों पर किया जाता है| नागालैंड से आये कलाकरों ने अपनी प्रस्तुति का अंत युद्धनृत्य(war dance)प्रस्तुत कर किया|यह नृत्य संगतम नागा जनजाति के योद्धाओं द्वारा युद्ध में विजय प्राप्त करने के पश्चात् जब वह अपने गाँव या घर लौटते हैं,तब इस
नृत्य शैली में वह नृत्य करते हैं|नागालैंड से आये कलाकारों ने युद्ध नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया|मंच पर नागालैंड से आये कलाकारों में अरिला,सेलिबा,नुकशिला और टिंगहोला आदि सहित लगभग 20कलाकारों ने मंच पर नृत्य प्रस्तुत किया|
त्रिपुरा से आये कलाकारों नेगोरिया नृत्य से अपनी प्रस्तुति को प्रारंभ किया| गोरिया नृत्य गोरिया देव के लिए किया जाता है, यह नृत्य अप्रैल के माह में एक सप्ताह तक किया जाता है| गोरिया उत्सव त्रिपुरा का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है| गोरिया नृत्य के बाद त्रिपुरा के कलाकारों ने तंग्बिती नृत्य प्रस्तुत किया| लड़के और लड़कियों द्वारा द्वंदात्मक लय प्रस्तुत किया गया| त्रिपुरा से आये कलाकारों ने तंग्बिती नृत्य के बाद अपनी प्रस्तुति का अंत लेबंग नृत्य से किया| लेबंग असल में एक कीटक होता है,जो फसलों को नुकसान पहुंचाता है|अतः लड़के द्वारा बांस की मदद से ध्वनि निकाली जाती है और लड़कियाँ कीटकों को पकड़ लेती हैं|त्रिपुरा के कलाकारों ने लेबंग नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया| मंच पर त्रिपुरा से आये कलाकारों में हेमन, बापी, प्रमिला और बिरजा आदि सहित लगभग 20 कलाकारों ने मंच पर नृत्य प्रस्तुत किया|
नृत्यों के बाद देवीलाल नाग के निर्देशन में नाटक कुंती के परिताप का मंचन हुआ| डॉ. राम कुमार वर्मा द्वारा लिखित कुंती के परिताप की कुंती वह नारी है, जो सेवा रूपी यज्ञ की समिधा में जलना जानती है और अपनी सेवा में भस्म बनकर रह जाती है| सदियों से हर युग, हर काल में नारी ही कुल मर्यादा की
संरक्षक रही है| जब भी समाज में धर्म स्थापना पर नियम स्थापना पर कोई संकट के बादल मंडराये हैं, तो नारी ही वह शक्ति बन कर सामने आयी है, जिसके त्याग और बलिदान से सृष्टि की संरचना और संरक्षण में प्रमुख
भागीदारी रही है| इस नाटक में कुंती समाज के नियम की स्थापना हेतु अपना स्नेह, ममत्व सब कुछ दाव पर लगा देती है| कुंती के परिताप नाटक के केंद्र में कुँवारी कन्या के अज्ञानतावश मातृत्व की दिशा में चले जाने पर उसके
भीतर चलने वाले भावनात्मक संघर्ष को निर्देशक देवीलाल नाग ने मंच पर बड़ी ही ख़ूबसूरती से प्रस्तुत किया| इस नाटक में मंच पर पारुल सिंह, अर्जुन सिंह परमार, मिथुन खोटे, भूपेन्द्र साहू, रामचंद्र सिंह, डबल कुमार, मयंक
यादव, संगीता सिन्हा, अगेश नाग सक्सेना, रोहित वैष्णव, योगी चंद्रवंशी, नवीन श्याम, अजय श्याम, मुरली निषाद और तुलसी राम नाग आदि ने अपने अभिनय से दर्शकों को मोह लिया| इस प्रस्तुति के दौरान गायन में जयंती यादव,
मीणा निषाद, पुष्पा शंकर साहू, पारुल सिंह और संगीता सिंह ने साथ दिया| संगतकारों में हारमोनियम पर देवी लाल नाग ने, बेंजो पर भूषण नेतनाम ने, बाँसुरी पर शंकर साहू ने, तबले पर गणेश निषाद ने, ढोलक पर चैतराम डहारिया
ने साथ संगत की| वेशभूषा में संगीता सिन्हा और पारुल सिंह ने, प्रकाश परिकल्पना में धन्नू लाल सिन्हा ने, रूप सज्जा में नरेन्द्र सिंह बजरंग और पुष्पा ने सहयोग किया| इस नाटक का लेखन डॉ. राम कुमार वर्मा ने किया है
और संगीत एवं नाट्य निर्देशन देवीलाल नाग ने किया|




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