भोपाल नगर निगम के दामन में एक और घोटाला, नियमों की धज्जियां उड़ाई गई

लगातार सामने आ रहे घोटालों से बदनामी झेल रहे भोपाल नगर निगम के दामन में एक और घोटाला हो गया है। इसमें निगम के अफसरों की संलिप्तता के साथ नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं।

सामाजिक व आरटीआई कार्यकर्ता अजय पाटीदार द्वारा सूचना के अधिकार से प्राप्त दस्तावेजों से गड़बड़ी सामने आई है। प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार-

1.टेंडर जारी नहीं किया गया जबकि टेंडर का उल्लेख दस्तावेजों में हर जगह किया गया। आश्चर्यजनक रुप से टेंडर का कोई नम्बर भी नहीं हैं।

2. पांच कंपनियों के छह प्रतिनिधियों की प्री बिड मीटिंग के बाद दो कंपनियां अयोग्य पाई जाती हैं। समस्त दस्तावेजों में इन कंपनियों को अयोग्य घोषित करने के कारण के साथ नाम तक नहीं लिखा गया है।

3.शेष बची तीन कंपनियों में से दो के द्वारा दिए गये दरों में भारी अंतर है। यूनिपोल ने जहां 25 रूपये 76 पैसे प्रति वर्गफुट कोट किए तो वहीं अन्य दो ने क्रमश: 16 रुपये 10 पैसे व 14 रुपये 95 पैसे प्रस्ताव दिया। विशेषज्ञों के अनुसार इस स्थिति में पुन: टेंडर होना चाहिए था।

4. आरएफपी (रिक्वेस्ट फॉर प्रोपोजल) में बताए गये 160 स्थानों पर गैन्ट्री न लगाकर मात्र 15 लोकेशन पर गैन्ट्री लगाई गई। धांधली में पहले गैन्ट्री स्थापित की गई व उसके बाद रसूख के दम पर अनुमति प्राप्त की गई जो कि नियम विरुद्ध है। इनकी संख्या 48 है।

5. तकनीकी स्ट्रक्चर डिजाईन व विंड प्रेशर इत्यादि से संबंधित स्ट्रक्चर इंजीनियर से प्रमाण प्राप्त कर प्रस्तुत करने को आदेशित किया गया। आज तारीख तक कंपनी ने निगम के आदेश का पालन नहीं किया है। इसके पीछे कारण कंपनी द्वारा नियमों की अवेहलना कर गैन्ट्री स्थापित करना है।

6.कंपनी से प्राप्त होने वाली राशि में भी निगम अफसरों ने लाभ पहुंचाया। गैन्ट्री में विज्ञापन के क्षेत्रफल गणना गलत कर वास्तविक राशि नहीं वसूली गई। तत्कालीन उपायुक्त राहुल सिंह राजपूत ने राशि कम कर वसूली आदेश दिए। जबकि संक्षेपिका में निगम को हर हाल में कंपनी से प्रतिवर्ष दो करोड़ के ऊपर आय होनी थी। इसमें प्रतिवर्ष पांच प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होनी थी।

महापौर व आयुक्त के मौखिक निर्देश वाली गिरी थी गैन्ट्री

हाल ही में बाणगंगा चौराहे पर कंपनी द्वारा लगाई गई गैन्ट्री तेज हवा व आंधी में गिर गई थी। इसमें मालहानि हुई थी। ये उन बाईस गैन्ट्रियों में से एक थी जो महापौर आलोक शर्मा और तत्कालीन आयुक्त छवि भारद्वाज द्वारा मौखिक निर्देश पर लगाई गईं थीं। गलत तरीके से लगाई गयी गैन्ट्री के गिरने के वक्त वहां किसी के मौजूद नहीं होने से जनहानि नहीं हो पाई थी।

नाम की निविदा समिति:

टेंडर जारी नहीं करने वाली निविदा समिति में तत्कालीन नगर यंत्री एके नंदा, संयुक्त संचालक लेखा विष्णुदत्त श्रीवास्तव, नगर यंत्री जीएस सलूजा, उपायुक्त हरीश गुप्ता, सहायक प्रोग्रामर अंदलीब वारसी शामिल हैं। गैन्ट्री के लिए जारी होने वाले काम के लिए इस समिति को ही टेंडर सुनिश्चित करना था।

महज दस दिन में बिड ओपन:

टेंडर जारी नहीं करने के बाद बिड महज दस दिन में खोल दी गई। स्पर्धा के लिए नियमों का उल्लंघन हुआ। संक्षेपिका के लिए नस्ती पर सभी स्वीकृतियां आश्चर्यजनक रुप से एक ही दिन में दे दी गईं।

बीडीए ने मांगा है 15 लाख का हर्जाना:

भोपाल विकास प्राधिकरण की संपत्ति को गैन्ट्री स्थापित करने के दौरान हुई क्षति के खिलाफ प्राधिकरण ने पंद्रह लाख रुपये की मांग निगम से की है। जबकि नियमानुसार निगम को गैन्ट्री के कार्य में कोई आर्थिक भार नहीं उठाना हैं। इसका उल्लेख संक्षेपिका में भी है।

स्मार्ट सिटी के नाम की ली आड़:

दस्तावेजों में गैन्ट्री के काम को भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय की स्मार्ट सिटीज़ मिशन प्रोग्राम से जुड़ा होना बताया गया है। इसका जिक्र बिड डॉक्यूमेंट के क्लाज़ नौ में किया गया है। यहां प्रश्न उठता हैं कि जब स्मार्ट सिटी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाई गई है तो नगर निगम ने यह गैन्ट्री का कार्य क्यों जारी किया?

मीडिया रुल्स का भी किया उल्लंघन:

वर्ष 2016 के मध्य में गैन्ट्री स्थापना के लिए तैयारी शुरु हुई । इसमें एमपी आउटडोर एडवर्टाइज़मेंट मीडिया रुल्स 2016 का पालन करना था। रुल्स नहीं बनने के कारण विधिक सलाह मांगी गई थी। इसमें रुल्स आने के बाद उनका अनुसरण करने का सहमति पत्र भी कंपनी को देना था। गैन्ट्री गिरने के बाद निगम को कार्रवाई करनी थी जो कि नहीं की गई।

बिजली कनेक्शन और बीमा भी करवाना है जरुरी

कंपनी को प्रत्येक गैन्ट्री के लिए बिजली कनेक्शन लेना जरुरी है। साथ आमजन की सुरक्षा की जिम्मेदारी के लिए बीमा करवाना भी अनिवार्य है। इसकी स्थिति पर भी निगम ने संज्ञान नहीं लिया है। साथ ही अधिकारी भी कुछ कहने से बच रहे हैं।

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