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फिर कानूनी पेंच में फंसा पोषण आहार
आंगनवाड़ी केंद्रों में बंटने वाला पूरक पोषण आहार फिर से कानूनी पेंच में फंस गया है। हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने एक स्वयंसेवी संस्था की याचिका पर सरकार को यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। उधर, सरकार भी पोषण आहार को लेकर अंतिम फैसला नहीं ले पा रही है। नई व्यवस्था में भी लगातार संशोधन होने से महिला स्व-सहायता समूहों से उत्पादन कराने में देरी की आशंका है। इसका फायदा वर्तमान में पोषण आहार सप्लाई कर रहे ठेकेदारों को होगा।मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अक्टूबर 2016 में नई पोषण आहार व्यवस्था बनाने के निर्देश दिए थे। तब से पूरा मामला कानूनी पेचीदगी में फंसा है। पहले नई व्यवस्था को लेकर याचिका लगाई गई थी और अब नई पोषण आहार नीति पर आपत्ति ली गई है।
कोर्ट ने सरकार से नई नीति पर अब तक की गई कार्यवाही प्रस्तुत करने को कहा है। इसके लिए सरकार को छह हफ्ते का समय दिया है। यानी इस मामले में फैसला आने तक पूरक पोषण आहार की नई व्यवस्था चलन में नहीं आ सकेगी और पुरानी व्यवस्था से ही आंगनबाड़ियों को पोषण आहार बांटा जाता रहेगा।
स्थिति साफ नहीं कर पा रही सरकार
पोषण आहार को लेकर बुरी तरह से उलझ चुकी सरकार स्थिति साफ नहीं कर पा रही है। सरकार ने यह तो कह दिया कि महिला स्व-सहायता समूहों से पोषण आहार तैयार कराएंगे, लेकिन कारखाने तैयार करने और सप्लाई की रणनीति को लेकर रोज ही विचार बदल रहे हैं। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग राज्य आजीविका मिशन के मार्फत बुनियादी ढांचा तैयार कर रहा है।
पहले 22 जिलों में प्लांट लगाकर पोषण आहार सप्लाई करना रणनीति का हिस्सा था, लेकिन एक प्लांट पर डेढ़ सौ करोड़ का खर्च आने के बाद विभाग ने महज आठ प्लांट कर दिए।
सूत्र बताते हैं कि पोषण आहार के निर्माण, पैकिंग, मजदूर-कर्मचारियों की व्यवस्था और सभी जिलों में आहार पहुंचाने के लिए परिवहन की व्यवस्था पर अब तक ठोस काम नहीं हुआ है। विभाग में बैठकों का दौर तो चल रहा है, लेकिन अंतिम फैसले की स्थिति नहीं बन रही है। ऐसे में कानूनी पेच फंसने से पोषण आहार में और देरी की आशंका है।
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