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'काम पर फोकस करें, बाकी टेंशन कंपनी पर छोड़ दें'

‘काम पर फोकस करें, बाकी टेंशन कंपनी पर छोड़ दें’

काम पर फोकस करें, बाकी टेंशन कंपनी पर छोड़ दें। यह एक अच्छी कंपनी की पहचान है क्योंकि कंपनी में काम करने वाला कामकाजी उसके ऑफिस में उसके जीवन में कहीं भी जगह से ज्यादा समय गुजरता है। इसलिए आप सिर्फ काम पर फोकस करें, बाकी टेंशन कंपनी पर छोड़ दीजिए। एक कामकाजी आम नागरिक सबसे ज्यादा वक्त कहाँ बिताता है? घर, मार्केट या रिश्तेदारों में? शायद इनमें से कहीं नहीं… क्योंकि दिन में उसका सबसे अधिक समय उसके ऑफिस या काम की जगह पर ही जाता है। यह बात मोटिवेशनल स्पीकर अतुल मलिकराम ने कही है।

अब एक सामान्य कामकाजी इंसान के पास कितनी तरह की दिक्कतें या चिंताएँ होती हैं, इसका अंदाजा, इस लेख को पढ़ने वाले ज्यादातर लोग लगा सकते हैं। चिंताएँ भी विभिन्न प्रकार की होती हैं, जैसे परिवार की, परिजनों के भविष्य की, समय से पगार न मिलने की, अचानक छुट्टी की दरकार पूरी न होने की या सपनों की लम्बी कतार अधर में लटके होने की आदि। अब यदि एक व्यक्ति इन सभी चिंताओं के बीच कार्यस्थल पर काम करता है, तो क्या वह अपना सौ फीसदी दे पाने में सक्षम होता है? अधिकतर लोगों का जवाब न ही होगा। लेकिन यदि उसे कोई ऐसी कंपनी मिले, जहाँ ये सारी चिंताएँ, उसकी होकर भी उसकी न हो और सभी की जिम्मेदारी उसकी कंपनी ही उठाए.. तो!

जी हाँ… सुनने में यह जितना खूबसूरत दिख रहा है, धरातल पर देखने में और भी खास नजर आ सकता है। यदि एक कंपनी का संस्थापक अपने कर्मचारियों के परिवार के सदस्यों से जुड़ जाता है, तो वह उनके सुख-दुःख को समझता है और कई प्रकार से उन्हें सुलझाने की कोशिश करता है, जिससे उस कर्मचारी का बोझ काफी हद तक कम हो जाता है और वह ज्यादा लगन और प्रोडक्टिविटी के साथ काम कर पाता है। इससे उसके और उसकी कंपनी, दोनों की उन्नति के रास्ते खुल जाते हैं।

हम जानते हैं, आजकल दोस्त और रिश्तेदार सिर्फ कहने के लिए रह गए हैं। यह भी सच है कि कई लोग जो यह लेख पढ़ रहे हैं उन्हें बुरा लगेगा, पर यह एक कटु सत्य है। जब आप खुश हैं, तब सब आपके दरवाजे पर आएँगे, लेकिन जब आप दुखी होंगे, तब कोई नहीं आएगा और आता भी है तो बस दिखावे के लिए और कई बार तो दस बातें ऐसी कर जाने के लिए, जिससे आप और दुखी हो जाएँ। ऐसे में यदि कोई आपके दरवाजे आकर आपकी ओर अपनापन दिखाता है, तो उस दुःख से लड़ने की ताकत तो उसी वक़्त मिल जाती है, लेकिन यदि वह शुभचिंतक आपका बॉस हो, तो आप उस दुःख या पीड़ा से ऊपर आ जाते हैं। और यदि एक बॉस, जिसे आप न जाने कितने ही कारणों से कोसते हैं, उससे दूर भागते हैं, वही यदि आपका मसीहा बन जाए, तो फिर बात ही क्या…!

इसलिए मैं पहल करना चाहता हूँ कि हर एक कंपनी के संस्थापक को अपनी कंपनी के कर्मचारियों से व्यक्तिगत रूप से जुड़ना चाहिए, ताकि उसके छत्रछाया में जो लोग भी काम कर रहे हैं, वो पूरे मन से काम कर सकें और एक अच्छा माहौल बनाएँ, ताकि काम के लिए एक अच्छा वातावरण तैयार हो सके। इससे आपके ऑफिस में कार्यरत लोगों के परिजनों को भी तसल्ल्ली रहती है कि उनका बेटा या बेटी एक सुरक्षित और अच्छे वातावरण में काम कर रहा है और उसकी तरक्की पर भी कोई आशंका नहीं होती। कुल मिलाकर देखें, तो एक सफल व्यवसाय के लिए, कामगारों के साथ संबंध विकसित करना बहुत आवश्यक होता है। एक ऐसी कंपनी जो अपने कर्मचारियों को समझती है, उनकी समस्याओं का समाधान करती है, उनके जीवन में उन्हें उत्तम बनाने के लिए संबंधों को मजबूत बनाती है, तो ज़ाहिर तौर पर ऐसी कंपनी हमेशा अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल होती है।

जब एक संस्थापक अपने कर्मचारियों के परिवार से मिलते हैं, तो उनके द्वारा दिए गए प्यार और समर्थन से सभी लोग आपस में एक समूह बन जाते हैं। एक अच्छे संबंध के साथ, लोग बेहतर काम करने के लिए मोटिवेट होते हैं, उनकी संभावनाओं को समझा जाता है, और वे अपनी क्षमताओं को बढ़ा पाते हैं। इससे कंपनी को उनके भरोसे, उत्साह, और निष्ठा का फायदा मिलता है और इससे कर्मचारियों के लिए कंपनी के प्रति लंबी अवधि तक की निष्ठा बनाए रखना भी आसान हो जाता है।

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