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जेल के भीतर से चुनाव जीतने वाले अशोक वीर विक्रम सिंह भैया राजा के बेटे निर्दलीय लड़ेंगे
नैनीताल के जेल में बंद होने के बावजूद मध्य प्रदेश में निर्दलीय विधानसभा चुनाव जीतने वाले अशोक वीर विक्रम सिंह भैया राजा के दो बेटे इस बार निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने वाले हैं। पिता के चुनावी नारों और जीत के जश्न को आज तक पुराने लोग भूले नहीं हैं और उनके बेटों के अलग-अलग सीटों से निर्दलीय चुनाव लड़ने के लिए नामांकन पर्चा भर दिया है। नाम वापसी के बाद वे चुनाव में डटे रहकर अपने पिता की तरह कोई यादगार चुनाव लड़ते हैं या चुपचाप नाम वापस लेते हैं यह समय ही बताएगा। पढ़िये रिपोर्ट।

अशोक वीर विक्रम सिंह भैया राजा का छतरपुर और पन्ना जिले में 1980-90 में आतंक था और उनके यहां मगरमच्छ-अजगर पालतू जैसे थे। वे 1990 में उस समय चुनाव लड़े थे जब उन पर केंद्रीय गृह मंत्री रहे बूटा सिंह के रिश्तेदार की हत्या का आरोप था और वे उस आरोप में नैनीताल के जेल में बंद थे। बूटा सिंह के रिश्तेदार की हत्या का मामला तब के चर्चित व्यक्ति अकबर अहमद डंपी के फार्म हाउस से जुड़ा था क्योंकि लाश उसी फार्म हाउस पर मिली थी। हालांकि वे उस अपराधिक मामले से दोषमुक्त हो गए थे। मगर जेल में रहते हुए उन्होंने पवई विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा था और उनका चुनाव चिन्ह हाथी था।

उनके चुनाव प्रचार-जीत के जश्न के चर्चित नारे
उनका चुनाव प्रचार का नारा भी आतंक को बताता है जो मोहर लगेगी हाथी पर, नहीं तो गोली लगेगी छाती पर और लाश मिलेगी घाटी पर। इसके बाद वे 42000 वोटों से जीतकर विधानसभा पहुंचे तो भोपाल में हाथी पर सवार होकर विधानसभा पहुंचे थे जिसके बैनर पर नारा था भैया राजा जय गोपाल, हाथी पहुंच गया भोपाल। इसके बाद वे समाजवादी पार्टी से एक बार और विधायक बने लेकिन 2003 में चुनाव हार गए। 2008 में उनकी पत्नी आशारानी भाजपा के टिकट चुनाव जीती लेकिन दंपति का आतंक का उतना ही दर्दभरा हुआ और नौकरानी की आत्महत्या के मामले में जेल हुई। जेल में रहते उन्हें बीमार होने पर हमीदिया अस्पताल लाया गया जहां उऩकी मौत हो गई।
बेटों के नामांकन पर्चे दाखिल
छतरपुर व पन्ना जिले में आतंक के पर्याय अशोक वीर विक्रम सिंह भैया राजा के दो बेटों ने विधानसभा चुनाव 2023 में निर्दलीय चुनाव पर्चा भरा है। बिजावर से भुवन विक्रम ने तो पवई से विक्रमादित्य ने नामांकन पत्र दाखिल किया है। बिजावर से भुवन की मां आशा रानी विधायक रही थीं तो पवई से विक्रमादित्य के पिता अशोक वीर विक्रम सिंह। भुवन विक्रम तो बिजावर में कांग्रेस से टिकट मांग रहे थे और कई सालों से वे क्षेत्र में सक्रिय भी थे मगर उन्हें टिकट नहीं मिला तो वे निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं।




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