सिद्धा समारोह में निमाड़ी भक्ति गायन-जया नृत्य नाटिका की प्रस्तुति

शारदीय नवरात्रि के अवसर पर जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा देवी के विविध रूपों को प्रदर्शनकारी कला विधाओं के साथ समवेत करते हुए तीन दिवसीय सिद्धा समारोह का आयोजन जनजातीय संग्रहालय भोपाल के मुक्ताकाश मंच पर किया गया है।

समारोह में देवी के 108 स्वरूपों में से आद्या स्वरूप को भरतनाट्यम शैली में, दुर्गा स्वरूप को गणगौर और कथक शैली और जया स्वरूप को बुन्देली एवं समकालीन नृत्य विधाओं पर केन्द्रित कर नृत्य नाटिकाओं के माध्यम से तथा इसके साथ ही देवी की महिमा के गान को बुन्देली, बघेली और निमाड़ी बोली में संयोजित किया गया है। समारोह के तीसरे दिन 9 अक्टूबर को सौम्या मंगरोले और साथियों द्वारा निमाड़ी भक्ति गायन एवं भोपाल के योगेंद्र सिंह राजपूत और साथियों द्वारा बुन्देली और समकालीन नृत्य विधाओं में जया नृत्य नाटिका की प्रस्तुति दी गई। जिसका प्रसारण संग्रहालय के यूट्यूब चैनल https://youtu.be/qFe8dPZrqEc और फेसबुक पेज https://www.facebook.com/events/1236795130155285/?sfnsn=wiwspwa पर लाइव प्रसारित किया गया।

प्रस्तुति की शुरूआत सौम्या मंगरोले और साथियों द्वारा निमाड़ी भक्ति गायन से की गई। कलाकारों ने गणपति गरबो रमा तो बेगा आवजो…, थारा मंदिर म लागी जगा जोत देवी अन्नपूर्णा…, माता अम्बावन का अमलई…,सीता शिव पूजन जाय अलीरी…,छोरा रंगरेज का रंगी लाओ चुनरिया…, माता पानड़ पानड़ दिया वक…, निमाड़ी भक्ति गीतों की प्रस्तुति दी। इनके साथ मंच पर सह गायन में सोम्या मांगरोले, पूर्वा मांगरोले, अमृता मांगरोले, बांसुरी पर नितेश मांगरोले, हारमोनियम पर जितेंद्र शर्मा एवं ढोलक पर प्रकाश खेमे ने संगत की।

दूसरी प्रस्तुति योगेंद्र सिंह राजपूत और साथियों द्वारा बुन्देली और समकालीन नृत्य विधाओं में जया नृत्य नाटिका की दी गई। माँ दुर्गा के 108 नामों में एक नाम जया भी है, इसका मतलब जया माँ भी स्वयं दुर्गा मां ही हैं, क्योंकि वे हमेशा कल्याण प्रदान करती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार जय शब्द कल्याण का वाचक है और आकार दात्र वाचक है इसीलिए जो जय विजय या कल्याण नित्य प्रदान करती हैं उसे जया कहते हैं। इस नृत्य-नाटिका में तीन अलग-अलग कथाओं के माध्यम से परोपकार और दूसरों के प्रति कल्याणकारी भावना को दर्शाया गया है, आज के इस तेज़ भागते युग में जहाँ मानवीयता कम होती जा रही है और सभी मौके का फ़ायदा उठाने में लगे हुए हैं, जिसके लिए परोपकार या दूसरे का कल्याण करना तो दूर की बात है, बल्कि उल्टा अपने फ़ायदे के लिये दूसरे का नुकसान करने से तक लोग चूकते नहीं हैं। वहीं ये कथाएं हमें प्रेरित करती हैं और बताती हैं कि जीवन के असल सुख की अनुभूति निःस्वार्थ भाव से दूसरों का कल्याण करने में, परोपकार करने में ही है और जहाँ-जहाँ भी ये दूसरों का भला करने की भावना होती है, वहां स्वयं माता जया मौजूद होती हैं।

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