*एक तरफ प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान भ्रष्टाचार मुक्त और ज़ीरो टॉलरेंस की बड़ी बड़ी बाते करते है वहीं उनकी नाक के नीचे राजधानी भोपाल में प्रदेश के सबसे बड़े शैक्षणीक संस्थान बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में नाकाम साबित हो चुके है। बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय का एक शासकीय सेवक नरेंद्र त्रिपाठी जिसकी नियुक्ति दिनांक 26/10/1998 को आयोजित कार्यपरिषद की बैठक में होती है और 31/03/1999 को कार्यपरिषद की बैठक में निर्णय लिया जाता है की जो भी नियुक्ति 26/10/1998 की बैठक में की गई थी वो नियुक्ति आगामी छ: माह में स्वत ही समाप्त हो जायेगी। कार्यपरिषद में निर्णय होने के बाद भी मामला दबा दिया गया। सभी ज़िम्मेदार बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के तत्कालीन अधिकारी, ईसी सदस्यों के साथ सांठगांठ कर मामला उजागर नहीं होने दिया गया।*
*अब सवाल यही उठता है कि जब नियुक्ति खत्म कर दी गई थी तो किस हैसियत से आज भी उक्त व्यक्ति नौकरी कर रहा है? आखिर ऐसी क्या मजबूरी है की नरेंद्र त्रिपाठी की फर्जी नियुक्ति पर कोई कुछ नहीं बोलता? (छात्र छात्राएं आवाज उठाते हैं तो उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी जा चुकी है,वो तो अपनी आवाज उठा ही रहे है लेकिन ये समस्त ज़िम्मेदार मौन है ) तो इसका सीधा सा जवाब है एक बहुत बड़े लेवल पर परीक्षा में पास -फेल का धंधा,भ्रष्टाचार,सभी के आर्थिक लाभ।*
*21 सालो से फर्जी तरीके से बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में जमा बैठा है यह अदना सा कर्मचारी,जिसने इतने लंबे समय में विद्यार्थियो से फीस के रुप में एकत्रित लाखों रुपए के विद्यार्थी धन की आर्थिक हानि बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय भोपाल को पहुचाई है।*
*यह अदना सा कर्मचारी कुलपति, कुलसचिव एवं सभी कार्यपरिषद सदस्यों पर भारी सिर्फ इसलिए है क्योंकि सभी मिलकर अपनी अपनी आर्थिक उन्नति करने में व्यस्त है।सभी मिलकर शिक्षा के मंदिर बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय को खोंखला कर रहे है और अपना अपना उल्लू सीधा कर रहे है।अब जब मामला उजागर हो ही गया है तो आगे यह देखना बड़ा मजेदार होगा की उच्च पदों पर बैठे तमाम जिम्मेदार नेता,अधिकारी एवं वि. वि. के कुलपति,कुलसचिव इस मामले पर कुछ करते है या वो भी भ्रष्टाचार की इस चासनी में लिपट कर सो जाते है।
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