विकास ऐसा हो, जो धारण किया जा सके: मुख्य न्यायाधिपति मो. रफीक

तेरह सितम्बर को मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग का 27वां स्थापना दिवस मनाया गया। स्थापना दिवस कार्यक्रम का केंद्रीय विषय ’’संवहनीय विकास-मानव अधिकार’’ रखा गया था। वेबीनार के जरिए आयोग के सभागार में हुए कार्यक्रम में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति मोहम्मद रफीक मुख्य अतिथि के रूप में जबलपुर से वर्चुअली शामिल हुये।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधिपति श्री रफीक ने कहा कि मानव अधिकार, मानव के विकास की प्रतीति है। यह हमें एकात्म विश्व की संकल्पना से जोड़ती है। उन्होंने कहा कि भारत के संविधान की प्रस्तावना में ही मानव के अधिकारों की सुरक्षा निहित है। सितम्बर 2015 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा एजेण्डा 2030 घोषित कर संवहनीय विकास के 17 विशेष लक्ष्य तय किये गये। इस एजेण्डा की थीम लाइन ‘‘कोई भी पीछे ना छूटे’’ है। उन्होंने कहा कि संवहनीय विकास वह है, जो आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता किए बगैर वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करे। विकास ऐसा होना चाहिए, जो धारण किया जा सके और निरंतर आगे भी बढ़ता रहे। ऐसे विकास को ही संवहनीय विकास की संज्ञा दी गई है। संवहनीय विकास की व्याख्या तभी और अधिक चरितार्थ होगी, जब ऐसा विकास मानव अधिकारों को ध्यान में रखते हुए किया जाये। विकास के लाभ से कोई भी वंचित नहीं रहना चाहिए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग के माननीय अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री नरेन्द्र कुमार जैन ने की। कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में आयोग के माननीय सदस्यद्वय श्री मनोहर ममतानी एवं श्री सरबजीत सिंह, विषय विशेषज्ञ/मुख्य वक्ता के रूप में पधारे एनएलआईयू भोपाल के पी.जी. स्टडीज के डीन एवं विधि विभाग के प्रोफेसर (डा.) राजीव कुमार खरे, आयोग के सचिव श्री शोभित जैन, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक श्रीमती सुषमा सिंह सहित आयोग के अन्य सभी अधिकारीगण उपस्थित थे। स्थापना दिवस कार्यक्रम में मध्यप्रदेश के जिला न्यायालयों के सभी न्यायिक अधिकारीगण, केन्द्रीय जल आयोग, राज्य शासन के वन, खनिज, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग, जल एवं भूमि प्रबंधन संस्थान (वाल्मी), पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन (एप्को), म.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी), म.प्र. गृह निर्माण मण्डल (एमपी हाउसिंग बोर्ड) सहित नगर निगम परिषद, भोपाल के वरिष्ठ अधिकारियों तथा सभी पूर्व आयोग मित्रों ने वर्चुअल माध्यम द्वारा प्रतिभागी के रूप में सहभागिता की। आयोग के 27वें स्थापना दिवस के मौके पर मुख्य अतिथि द्वारा जबलपुर से एवं आयोग के सभी पदाधिकारियों द्वारा भोपाल से विषय आधारित पुस्तिका ’’संवहनीय विकास-मानव अधिकार’’ का विमोचन भी किया गया। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग की स्थापना 13 सितम्बर 1995 को हुई थी।
अध्यक्षीय उद्बोधन में मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग के माननीय अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री जैन ने कहा कि संवहनीय विकास एक मानव अधिकार है। हमें मानव विकास और सुख-शांति के बीच तालमेल बिठाने की आवश्यकता है। विकास जरूरी है, पर वह संवहनीय विकास की श्रेणी में आता हो। इसके लिये हमें अपने वनों की निर्मम कटाई पर रोक एवं वन्य जीवन की जातियों, प्रजातियों के संरक्षण की अधिकाधिक आवश्यकता है। प्रकृति के स्वतंत्र प्रवाह में कम से कम हस्तक्षेप होना चाहिए। हमें विकास के नाम पर विशाल बांधों के स्थान पर छोटे बांध एवं तालाबों का निर्माण करना चाहिए। प्रदूषण फैलाने वाले बडे़ उद्योगों की जगह लघु उद्योगों को प्रोत्साहन एवं संरक्षण मिलना चाहिए। रासायनिक उर्वरकों द्वारा भूमि के अत्यधिक दोहन की पूर्ति, देशी एवं घरेलू खादों द्वारा की जानी चाहिए। जन-जन में संवहनीय विकास के प्रति चेतना जागृत करने की आवश्यकता है। हमने सबके सर्वांगीण विकास में ही राष्ट्र और समाज के विकास की अवधारणा को आत्मसात् किया है। इस संदर्भ में जो सबके हितों का संवहन करे, वही संवहनीय विकास है। इसके लिए हमें विकास की एक ऐसी संतुलित और मध्यमार्गी दिशा की ओर बढ़ने की जरूरत है, जिसमें सबका हित हो, सबकी जीवन रक्षा हो, सबका कल्याण हो। अपने साथ-साथ अपनी पीढ़ी को एक सुनहरा कल देने के लिये हमे स्वयं बीड़ा उठाना होगा। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने एजेण्डा 2030 में ‘नो पावर्टी, जीरो हंगर’ सहित कुल 17 लक्ष्य तय किये हैं। ये सभी लक्ष्य संवहनीय विकास-मानव अधिकार हैं, की श्रेणी में ही आते हैं। उन्होंने स्थापना से लेकर मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग द्वारा अबतक किये गये प्रयासों एवं नवाचारों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी।                                
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता प्रो. (डा.) राजीव कुमार खरे ने कहा कि वह विकास, जो पर्यावरण को बिना क्षति पहुंचाए मानव जीवन को प्रगतिशीलता की ओर अग्रसर रखे, संवहनीय विकास है। पारम्परिक तौर पर आज भी विकास शब्द को अधिकतम व्यापार, विविध संसाधनों का अधिकतम दोहन, अधिकतम निर्माण कार्य, अधिकतम भवन सामग्री और कृषि भूमि के अधिकतम उपयोग के संदर्भ में समझा जाता है, भले ही इन सबके लिए प्राकृतिक प्रक्षेत्रों को नष्ट करना पड़े। विकास की व्यापकता को हमें इस प्रकार समझने की आवश्यकता है, जो पर्यावरण एवं सामाजिक न्याय की सुरक्षा और इनकी वृद्धि करने के साथ-साथ स्वनिर्वाहित परिस्थितियों के लिए सतत् ज्ञान और समझदारी पैदा करने में भी सक्षम हो। उन्होंने कहा कि मानव जीवन के लिये हमें अपने दायित्वों को नये संदर्भों में पुर्नजीवित करने की जरूरत है, तभी विश्व का परिवेश बदलेगा। उन्होंने कहा कि संवहनीय विकास आज की जरूरत है। हमें इस संकल्पना के जरिए ही मानव जीवन के विकास और समुत्थान की ओर अग्रसर होना होगा। उन्होंने उच्चतम न्यायालय एवं विभिन्न उच्च न्यायालयों के निर्णयों और टिप्पणियों का हवाला देते हुए संवहनीय विकास को हमारे देश में एक कानूनी दर्जा दिये जाने की निरंतर प्रक्रिया और परंपरा के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि अब हमें मानववाद की ओर बढना होगा। मानव और जीवों का विकास ही संपूर्ण विश्व का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। 
आयोग के माननीय सदस्य श्री मनोहर ममतानी ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के सभी मामलों में संवहनीय विकास आवश्यक एवं अति महत्वपूर्ण है। इसी अवधारणा ने विकास एवं पर्यावरण का संरक्षण किया है। इसके जरिये ही विकास एवं पर्यावरण में संतुलन स्थापित हुआ है। यह सही है कि विकासशील देशों में एवं औद्योगिकीकरण में विकास महत्वपूर्ण होता है, लेकिन अब समय आ गया है कि इस प्रक्रिया में पर्यावरण की क्षति को अवरोधित एवं नियंत्रित किया जाये। विकास एवं पर्यावरण में उचित संतुलन आवश्यक है, जिसमें अन्य को प्रभावित किये बिना दोनों का सह अस्तित्व रह सके। संवहनीय विकास को अपनाने का निर्णय संयुक्त राष्ट्र शिखर सम्मेलन में वर्ष 2015 में किया गया। इसमें वर्ष 2016 से 2030 के लिये 17 लक्ष्य तय किये गये हैं। यदि यह लक्ष्य प्राप्त किये जाते हैं, तो निश्चित ही दुनिया में गरीबों का जीवन-यापन आसान होगा। इसलिये संवहनीय विकास की संकल्पना को मानव अधिकारों के रूप में स्वीकार किया गया है। निश्चित रूप से यह संकल्पना पूरे विश्व समुदाय के लिये मील का पत्थर है।
आयोग के माननीय सदस्य श्री सरबजीत सिंह ने कहा कि भारत के संविधान में दिये गये मौलिक अधिकार ‘जीने के अधिकार’ की व्याख्या बहुत व्यापक और वृहद है। इसी के अधीन संवहनीय विकास का अधिकार भी आता है। भारत के उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21, राज्यों के नीति-निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 48ए तथा अनुच्छेद 51 (1)(जी) में जंगलों, झीलों, नदियों एवं वन्य जीवन के संरक्षण के संबंध में नागरिकों के कर्तव्य निर्धारित किये गये हैं। साथ ही समय समय पर महत्वपूर्ण निर्णयों में प्रदूषक भुगतान सिद्धांत तथा सावधानतापूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किये गये हैं। इस प्रकार हमारे देश में पर्यावरण संरक्षण के संबंध में ठोस कानूनी ढांचे की व्यवस्था की गई है, जो मानवता के प्रति जवाबदारी का प्रतीक है। जलवायु, प्रकृति की गोद में जैविक, अजैविक, नवीकरणीय तथा अनवीकरणीय संपदा पर स्वामित्व संपूर्ण मानवता एवं उसकी आने वाली पीढ़ियों का है। अपने कानूनी ढ़ांचे में मानव विकास के लिये संवहनीय विकास की पारदर्शी विधिक व्यवस्था को सदृढ़ कर हम सभी को सक्रिय योगदान देना होगा। तभी सबका विकास, सबका कल्याण सुनिश्चित होगा। 
कार्यक्रम के प्रारंभ में विषय प्रवर्तन करते हुये आयोग के सचिव श्री शोभित जैन ने संवहनीय विकास के संदर्भ में मानव अधिकारों और सबके हितों की रक्षा पर बल दिया। उन्होंने कहा कि जिसमें मानव जीवन के संचयी विकास की सम्भाव्यता और सबका हित संवर्धन हो, ऐसा विकास ही संवहनीय विकास है। सस्टेनेबल डेवलपमेन्ट शब्द का उपयोग सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा नियुक्त ‘विश्व पर्यावरण एवं विकास आयोग’ द्वारा किया गया था। इस आयोग की अन्तिम रिपोर्ट में इसकी मूल अवधारणा ‘हम सबका भविष्य’ निर्धारित किया गया था। इस आयोग ने ‘संवहनीय या स्वनिर्वाहित’ शब्द को वह विकास या प्रगति, जो ‘आगामी पीढ़ी के लिए उनकी जरूरतों को बिना प्रभावित किए वर्तमान की आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित कर सके, के रूप में परिभाषित किया था। 
कार्यक्रम के अंत में आयोग के उप सचिव श्री सुनील कुमार जैन ने स्थापना दिवस में शामिल हुए सभी अतिथियों, कार्यक्रम को सफल बनाने में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग देने वाले आयोग के सभी अधिकारियों, कर्मचारियों सहित कार्यक्रम में वर्चुअली जुड़े सभी अधिकारियों/प्रतिभागियों का आभार ज्ञापित किया। वेबीनार कार्यक्रम का सफल संचालन उद्घोषिका श्रीमती सुनीता सिंह ने किया।  (फोटो संलग्न है)

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