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गौरीशंकर बिसेन की नियुक्ति अवैध और उच्च न्यायालय की अवमानना: केके मिश्रा
मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के महामंत्री और मीडिया प्रभारी के.के. मिश्रा ने ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दिलाये जाने की पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में जारी मुहिम से हताहत शिवराज सरकार द्वारा पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष के रूप में श्री गौरीशंकर बिसेन की ताबड़तोड़ की गई नियुक्ति को अवैध, उच्च न्यायालय की अवमानना और सरकार की राजनैतिक खीज बताया है।
मिश्रा ने कहा कि पूर्ववर्ती कमलनाथ सरकार ने हमारे वरिष्ठ सहयोगी श्री जे.पी. धनोपिया को पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष मनोनीत किया था, दुर्भाग्यवश खरीद-फरोख्त के बाद काबिज हुई शिवराज सरकार ने राजनैतिक दुर्भावनावश श्री धनोपिया को अध्यक्ष न मानते हुए उन्हें उपलब्ध सुविधाएं तक छीन ली। जिसके विरूद्व उन्होंने उच्च न्यायालय जबलपुर में याचिका दायर कर राज्य सरकार के निर्णय के विरूद्व स्थगन आदेश भी प्राप्त कर लिया। जिसका फैसला अभी तक नहीं हुआ है। लिहाजा, इन परिस्थितियों में राज्य सरकार को इस पद पर किसी अन्य व्यक्ति की नियुक्ति का नैतिक और संवैधानिक अधिकार नहीं है? सरकार ने ऐसा कर न केवल माननीय उच्च न्यायालय की अवमानना की है, बल्कि अपनी ओछी मानसिकता का भी परिचय दे डाला है।श्री मिश्रा ने कहा कि भाजपा का यह तर्क कि राज्य सरकार ने पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग बनाया है, समझ से परे हैं। भाजपा का यह तर्क यदि मान भी लिया जाये तो यह स्पष्ट हो रहा है कि आज भी पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष के रूप में उसकी स्वीकृति जे.पी. धनोपिया के साथ है। अतः वे आज भी पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष के रूप में काबिज हैं? जब भाजपा ही उन्हें पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष के रूप में स्वीकार कर रही है तो पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग बनाने की आवश्यकता उसे क्यों पड़ी, स्पष्ट होना चाहिए? कांग्रेस इस ओछी भाजपाई राजनीति को लेकर पुनः उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटायेगी। कांग्रेस की निगाह में इस संवैधानिक पद पर श्री जे.पी. धनोपिया आज भी उक्त पद पर काबिज हैं। किसी भी संस्था अथवा आयोग का नाम बदल देने से उसके उद्देश्य और कार्य नहीं बदले जाते! भाजपा क्या यह भी स्पष्ट करेगी कि योजना आयोग का नाम नीति आयोग और व्यापमं का नाम पीईबी रख देने से उसके उद्देश्य व कार्य बदल गये हैं? ——–




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