कालबेलिया समुदाय की कला परंपरा पर आधारित कला शिविर

 मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग द्वारा जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी की ओर से जनजातीय संग्रहालय में 25 से 3 सितंबर तक 10 दिवसाय निस्पन्द कला शिविर का आयोजन किया गया है। जिसमें पहले दिन अतिथियों का स्वागत बड़े ही अनूठे ढंग से किया गया। कालबेलिया समुदाय के कलाकारों बीन, ढोलक, मंजीरा, डफली की धुन पर नृत्य कर स्वागत किया।

वहीं कार्यक्रम के पहले दिन उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि विमुक्त घुमंतू तथा जनजाति विकास एवं कल्याण बोर्ड समाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्रालय के अध्यक्ष श्री भिकू रामजी इदाते (दादा), प्रमुख सचिव संस्कृति श्री शिव शेखर शुक्ला, संस्कृति संचालनालय संचालक श्री अदिति कुमार त्रिपाठी,  अकादमी के निदेशक डॉ. धर्मेंद्र पारे के साथ अन्य अधिकारी, कर्मचारी उपस्थित रहे।  

  • मध्यप्रदेश के साथ राजस्थान के करीब 50 कलाकारों ने हिस्सा लिया है 

कार्यक्रम की शुरूआत दीप प्रज्वलन और स्वागत से हुआ। जिसमें अतिथियों के स्वागत के साथ सभी कलाकारों को पुष्प देकर उनका स्वागत किया गया। इस शिविर में मध्यप्रदेश के साथ राजस्थान  के करीब 50 कलाकारों ने हिस्सा लिया है। वहीं शिविर के उद्घाटन समारोह के पहले  विमुक्त घुमंतू तथा जनजाति विकास एवं कल्याण बोर्ड समाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्रालय के अध्यक्ष श्री भिकू रामजी इदाते (दादा) ने कालबेलिया घमन्तू जनजाति की गुदड़ी निर्माण, सुरमा, झोली जैसे अन्य शिल्प और परंपरा के बारे में जाना। साथ ही कलाकारों ने दर्शकों के सुरमा (काजल) बनाने की कला और उसकी खासियत भी बताई।   

  • विमुक्त समुदाय का मतलब है स्वतंत्रता सैनानी 

कार्यक्रम में जनजातीय संग्रहालय के निदेशक डॉ. धर्मेंद्र पारे ने कहा कि अन्य कई समुदायों की कला, परंपरा और शिल्प पर काम किया जा चुका है लेकिन घुमंतू समुदाय की कला शिल्प और परंपरा पर पहली बार काम किया जा रहा है। इससे इनकी कलाओं और परंपराओं को सहेजा जा सकेगा। मुख्य अतिथि श्री भिकू रामजी इदाते (दादा) ने कहा कि विमुक्त समुदाय का मतलब है स्वतंत्रता सैनानी। अगर हम साल 1857 के पहले भी देखें तों हमें कई ऐसे समुदाय के लोगों के काम देखने को मिलते हैं जिन्होंने अपने राष्ट्र को सहेजने के लिए काम किया। वहीं घुमंतू समुदाय में 20 से अधिक ऐसे समुदाय हैं जो अपने कौशल विकास के लिए जाने जाते हैं और वे अपने उस कौशल में सर्वोपरि हैं। इन शिविर के जरिए सभी समुदाय की कला और परंपरा को सहेजने के साथ एक दूसरे को उसके बारे में जानकारी भी मिल सकेगी।  

-पारंपरिक वेशभूषा और अन्य निर्माण 

निस्पन्द कला शिविर 25 अगस्त से 3 सितम्बर तक होगा। जिसमें गुदड़ी सृजन के साथ ही कढ़ाई-बुनाई, पारंपरिक वेशभूषा, मोली की माला एवं कांच कार्य के साथ समुदाय में बनाये जाने वाला सुरमा (काजल)  और अन्य निर्माण होगा। वहीं शिविर में निर्मित सामग्री को दर्शक ‘चिन्हारी’ सोविनियर शॉप से क्रय भी कर सकेंगे।  इस शिविर का अवलोकन रोजोना दर्शक दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक कर सकते हैं। 

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