वनमाली जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विमर्श

हिन्दी साहित्य जगत के महत्वपूर्ण कथाकार स्वर्गीय जगन्नाथ प्रसाद चौबे ‘वनमाली’ की 109 वीं जयंती पर पुण्य स्मरण: वनमाली जी कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह आयोजन विश्व रंग के अंतर्गत रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के तत्वावधान में वनमाली सृजन पीठ, भोपाल एवं मानविकी एवं उदार कला संकाय द्वारा आयोजित किया गया। इस अवसर पर वनमाली जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर सार्थक रचनात्मक विमर्श किया गया।

वरिष्ठ कवि कथाकार एवं रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, विश्व रंग के निर्देशक श्री संतोष चौबे ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि वनमाली जी का कहना था कि ” मैं कहानी में सब बातें छोड़ने को तैयार हूं पर उसमें इंटेंसिटी और ड्रामैटिक एलीमेंट का होना मैं बहुत लाजिम समझता हूं। शायद ये दो चीजें ही कहानी की टेक्नीक की जान है। मैं यह नहीं कहता कि जीवन तत्व अपने पूरे रूप में इन बातों में बाधा डालता है किन्तु मेरे दिमाग में वह आलोचना और विश्लेषण ही बनकर आता है।”
संतोष चौबे ने आगे कहा कि वनमाली जी कहा करते थें कि ” कहानी को तत्काल फिनिश मत करो। चार-छ: महिने उसे संभाल कर रखों। फिर उसे इत्मीनान से पढ़ों। भाषा की सुक्ष्मता और कसावट के लिए यह बहुत जरूरी है।” वनमाली जी कहानी को कविता की तरह लिखते थे। उनकी कहानियों में काव्यमय भाषा शिल्प, दृश्यमय लेखन, गहन विश्लेषण एवं मनोवैज्ञानिक सूझबूझ स्पष्ट रूप से रेखांकित होती है। उन्होंने आगे कहा कि कोई भी कहानी वास्तविक नहीं होती है पर वह वास्तविकता के करीब होती है। उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात रेखांकित करते हुए कहा कि नाराजगी साहित्यकार की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है। वनमाली जी से लेकर विष्णु खरे और बलराम गुमाश्ता में यह नाराजगी परिलक्षित होती है जो कि स्वाभाविक है।
इस अवसर पर श्री संतोष चौबे ने वर्ष 1993 के अपने खंडवा प्रवास का जिक्र करते हुए कहा कि वनमाली जी जिस स्कूल में पढा़ते थे वहां के पूराने विद्यार्थी स्कूल की 25 वीं सालगिरह मना रहे थें।अम्मा और मुझे बुलाया गया था। तब मैं 37 वर्ष का था। मैं मंच पर था। वनमाली जी के पढ़ाएं विद्यार्थी अपने अनुभव साझा कर रहे थे। वे बता रहे थे कि वनमाली जी बड़े कठोर शिक्षक थे। थप्पड़ मार देते थे। कान पकड़ लेते थे। गेट पर खड़े रहकर विद्यार्थियों को सबक सीखाते थे। मैं मंच पर सोच रहा था कि हर छात्र उनकी कठोरता की बात करते हुए उन्हें अपना आदर्श शिक्षक बताते हुए भावुक हो रहे थे। आज जबकि हमारे जीवन से आदर्श गायब होता जा रहा है।हमारे पूर्वजों ने जो मूल्य हमें सौंपे है हम उन आदर्शों तक नहीं पहुंच पा रहे है। हम अपने शिक्षक को याद करते हुए उन मूल्यों एवं आदर्शों को याद करते है। जीवन का मूल आधार आदर्श ही होते है। उन्होंने इसी तारतम्य में आगे कहा की कहानी को जहां लेंडिंग करना है वह तो आदर्श ही होगा। जो हम बनना चाहते थे, वह भले ही हम ना बन सके पर वहीं जाना चाहते है।मनुष्य का जो चरित्र है वह उसे आदर्श बनाता है। इस अवसर पर वरिष्ठ कवि श्री बलराम गुमाश्ता ने कहा कि वनमाली जी की कहानियों में प्रेम, करुणा, मानवीय एवं पारिवारिक संबंधों की गहराई बहुत शिद्दत के साथ मौजूद है। उनकी कहानियां मानवीय संबंधों के प्रति आस्था एवं विश्वास जगाती है। उनकी रचनाओं में गजब की इंटेंसिटी है। घटनाओं की प्रधानता है। जीवन के रहस्यों को घटनाएं निर्धारित करती है। घटनाएं घटती रहती है और वे जीवन को उद्घाटित करते हुए निरंतरता प्रदान करती है।
बलराम गुमाश्ता ने आगे कहा कि जब प्रेमचंद लिख रहे थे, जैनेन्द्र लिख रहे थे, वनमाली जी भी लिख रहे थे। वनमाली जी देशभर की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रमुखता से छप रहे थे। वे अपने समय से बहुत आगे का लिख रहे थे। उस समय के समाज और समय से आगे चल रहे थे।
श्री बलराम गुमाश्ता ने आगे कहा कि महात्मा गांधी जी के आह्वान पर वनमाली जी ने प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था। प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करते हुए प्रौढ़ों के मनोविज्ञान को समझते हुए उसे आत्मसात करने की जरूरत होती है। प्रौढ़ों का सम्मान का ध्यान रखना होता है। यह कार्य एक बेहतर अनुशासित सामाजिक विश्लेषक ही कर सकता है।
उल्लेखनीय है कि वनमाली जी के इसी कार्य को श्री संतोष चौबे जी ने राष्ट्रीय साक्षरता आभियान के रूप में देश के सैकड़ों जिलों, लाखों गावों कस्बों में बड़े पैमाने पर नेतृत्व प्रदान किया। श्री बलराम गुमाश्ता ने आगे कहा कि सुप्रसिद्ध रचनाकार विष्णु खरे वनमाली जी के विद्यार्थी थे। जब वनमाली जी को पता चला कि विष्णु खरे लिखते है तो एक शिक्षक रचनाकार का धर्म निभाते हुए उन्होंने विष्णु खरे को बहुत प्रोत्साहित किया। विष्णु खरे लिखते है कि वनमाली जी मेरे सरोगेट फादर थे। मेरे अर्जी पिता थे। और मेरे पिता के तबादले के बाद शायद ये और भी गाढ़ा हो गया उनका ये अर्जी पुत्रत्व। श्री बलराम गुमाश्ता ने कहा कि वनमाली जी के विज़न को व्यापक फलक देने के लिए देश भर में वनमाली सृजन पीठ एवं वनमाली सृजन केन्द्रों का गठन किया गया है। यहां सभी की आवाजाही संभव है। हजारों रचनाकार इनसे जुड़कर अपना रचनात्मक योगदान दे रहे है। इस अवसर सुश्री विशाखा राजुरकर राज ने वनमाली जी की चर्चित कहानी “जिल्दसाज” का बहुत ही भावपूर्ण
पाठ किया। डॉ. मौसमी परिहार ने बहुत ही रोचकता के साथ वनमाली जी की व्यंग्य रचना ‘नई तालीम’ का पाठ किया। इस अवसर पर कुलपति डॉ. ब्रह्म प्रकाश पेठिया, उप-कुलपति डॉ. संगीता जौहरी सहित विश्वविद्यालय के फेकल्टी सदस्य साहित्यानुरागियों ने रचनात्मक भागीदारी की। कार्यक्रम का सफल एवं विचारोत्तेजक संचालन यूवा आलोचक अरुणेश शुक्ल द्वारा किया गया। अंत में सभी के प्रति आत्मीय आभार मानविकी एवं उदार कला संकाय की विभागाध्यक्ष डॉ. उषा वैद्य ने माना। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. उषा वैद्य एवं संजय सिंह राठौर ने किया।

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