गुरइया माता में स्थापित है मां ब्रह्मचारिणी का अंश

नवरात्रि की दूसरी महाशक्ति को अद्भुत तपस्या के कारण ब्रह्मचारिणी के रूप में पूजा जाता है। ब्रह्म का अर्थ होता है तपस्या का चरम बिन्दु और चारिणी को आचरण करने वाली के रूप में समझा जाता है। कुल मिलाकर तपस्या के अनुशासन को चरम सीमा तक आचरण में उतारने वाली मां को ब्रह्मचारिणी कहते हैं। इस प्रकार विश्वास, एकाग्रता और लक्ष्यनिष्ठ होकर आज के दिन साधना करना चाहिए।

वैदिक कथानकों के अनुसार शैल पुत्री ने देवार्षि नारद के उपदेश से भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने हेतु कठोर तपस्या की। पहले फल-फूल, फिर पत्ते और अंत में जल तक का त्याग कर दिया। यह लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किया जाने वाला अडिग प्रयास था जो सफल हुआ। मां के इस स्वरूप की उपासना से जीवन का असाध्य से असाध्य लक्ष्य भी पूरा होता है।

               छतरपुर जिलामुख्यालय के दक्षिणी छोर पर बसे बगौता गांव के ऊंचे पठार पर स्थापित गुरइया माता का विग्रह वास्तव में मां ब्रह्मचारिणी का ही अंश है। यह स्थान प्राचीनकाल से ही पूज्य रहा है। स्थानीय निवासियों ने पीढी दर पीढी हस्तांरित होते मौखिक इतिहास के आधार पर बताया कि सैकडों वर्ष पहले इस पठारी टीले पर पेड के सहारे मां का एक विग्रह टिका था।

इस स्थान पर हमेशा ही साधुओं के डेरे रहते थे। डेरे में रहने वाले साधु ही मां की पूजा-अर्चना किया करते थे। उस समय चारों ओर वियावन जंगल हुआ करता था जिसके मध्य एक विशाल जलाशय होता था। कालान्तर में पेड के सहारे टिकी मूर्ति को संरक्षित करने हेतु छोटी सी मढिया का निर्माण किया गया। मढिया में केवल मूर्ति के स्थापित होने की ही जगह थी। श्रध्दालु बाहर से झुककर ही पूजा किया करते थे।

               पठार के शीर्ष तक पहुंचने हेतु अब सीढियों का भी निर्माण हो गया है। मां ब्रह्मचारिणी के प्राचीनतम विग्रह की स्थापना में मंदिर में कर दी गई है। सामने की ओर एक छोटा सा बरामदा भी है जो वर्षा और धूप से श्रध्दालुओं को बचाता है। स्थानीय लोगों के प्रयासों से यहां पहुचना अब सुगम हो गया है।

               नवरात्रि में यहां संकल्पित साधना करने से निश्चय ही लक्ष्य भेदन होता है। वैदिक ग्रन्थों में वर्णित सूत्रों के आधार पर अध्यात्मिक उपचार करने से दैहिक, दैविक और भौतिक समस्याओं का निदान पूरी तरह से सम्भव है। तो आइये करें मन, वचन और कर्म से मां की उपासना।

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