विमुक्त जातियों के प्रति भ्रांतियों का विखण्डन जरूरी : श्री भीकू रामजी इदाते

मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग द्वारा मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा 26 से 28 फरवरी, 2021 तक आयोजित मप्र की विमुक्त जातियों पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में आज विमुक्त जातियों की प्रति हमारी मानसिकता स्वतंत्र नहीं है। हम विमुक्त जातियों और उनकी संस्कृति को भारतीय दृष्टिकोण से न देखकर पाश्चात्य दृष्टिकोण से देखने के आदी हो गए हैं।

ये विचार मप्र जनजातीय संग्रहालय में विमुक्त जातियां और उनकी संस्कृति पर हो रही तीन दिवसीय शोध संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में भीकू रामजी इदाते पूर्व अध्यक्ष राष्ट्रीय विमुक्त, घूमंतु तथा अर्द्ध घुमंतू जनजाति आयोग, ने कही। उन्होंने कहा कि आक्रान्ता सत्ताधारियों में मुगलों और अंग्रेजों ने एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत भारतीय विमुक्त जातियों को मूल जातियों से विकृत कर उन्हें अपराधियों की श्रेणी में डाल दिया, जबकि वे स्वतंत्र योद्धा होने के साथ संस्कृति और प्रकृति को संरक्षित करते रहे हैं। इन जातियों के समग्र विकास के लिए आयोग गठित होने के बाद सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं।  

वर्तमान समय में यह आवश्यक है कि जो क्षेत्र छूट गये हैं उनका तटस्थ भारतीय दृष्टि से अध्ययन कराया जाना चाहिए। सभी समाजों में अच्छी और बुरी रीतियां होती हैं लेकिन उन रीतियों को इन जातियों के परिचय का माध्यम नहीं बनाना चाहिए। 

            संगोष्ठी में शोध दृष्टि वक्तव्य रखते हुए शासकीय हमीदिया कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ पीके जैन ने शोध दृष्टि वक्तव्य रखते हुए विमुक्त जातियों में शिक्षा के महत्व को बताते हुए कहा कि यदि शिक्षा अपने सामाजिक जीवन का निर्वाह नहीं करती तो ऐसी शिक्षा अपने पथ से विमुख हो चुकी होती है। 

            ये देश की पहली ऐसी संगोष्ठी है जो विमुक्त जातियों पर आधारित है। इस संगोष्ठी का आयोजन यह दर्शाता है कि हम इस विषय को लेकर बहुत गंभीर हैं। 

            आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी के निदेशक डॉ. धर्मेन्द्र पारे ने कहा कि विमुक्त जाति और उनकी संस्कृति के प्रति न्यायसंगत शोध का अभाव है। विमुक्त जातियों की संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा का वास्तविक अध्ययन आवश्यक है। हमारे प्रयास हैं कि मप्र की 21 विमुक्त जातियों पर काम करने का नूतन उन्मेष हो। जिनका जीवन इन जातियों के अध्ययन पर निकल गया उनसे प्रेरणा लें और इस दिशा में शोध के लिए आगे बढें, अकादमी भी इसके लिए सहयोग करेगी। 

            उद्घाटन सत्र पद्मश्री भूरी बाई के मुख्य आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम समन्वयक डॉ. अल्पना त्रिवेदी ने आभार और संचालन शुभम चौहान ने किया। 

प्रथम अकादमिक सत्र 

प्रथम अकादमिक सत्र की अध्यक्षता पद्मश्री गिरीश प्रभुणे ने की इस सत्र में अश्विन शर्मा जयपुर, कैलाश माण्डलेकर खण्डवा, सूर्यकांत भगवान भिसे महाराष्ट्र, डॉ टीकमणि छिंदवाड़ा, शैलेन्द्र शरण खण्डवा, कृष्णचंद्र सिसोदिया रतलाम ने इन जातियों की संस्कृति पर केन्द्रित अपने आलेख प्रस्तुत किए। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए पद्मश्री श्री प्रभुणे ने कहा कि विमुक्त जातियाँ भारतीय सनातन परंपरा से जुड़ी हुई हैं| इनकी संस्कृति का सकारात्मक अध्ययन समय की आवश्यकता है|   

द्वितीय अकादमिक सत्र की अध्यक्षता डॉ श्रीकृष्ण काकड़े तथा संचालन डॉ मोनिका जैन ने किया। इस सत्र में रमाकांत ग्वालियर, डॉ रेणु गुप्ता गुना, सौरभ गुर्जर रतलाम, अरूण सातले खण्डवा, बसोरी लाल सिवनी, डॉ निशा जैन बीना, पूजा सक्सेना भोपाल ने अपना शोध आलेख प्रस्तुत किया।  

द्वितीय सत्र की अध्यक्षता कर रहे डॉ काकड़े कि भले ही इन घुमंतू जनजातियों के पास कोई शिक्षा की डिग्री न हो लेकिन इनके पास परंपरागत ज्ञान की अथाह पूंजी है। मध्यभारत इन जातियों का केन्द्र है।  उद्घाटन अवसर पर अशोक मिश्र द्वारा संपादित एवं अकादमी द्वारा “विमुक्त जातियों की संस्कृति, कला एवं मौखिक परंपरा” पर प्रकाशित चौमासा के 114वे अंक का लोकार्पण हुआ। 

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