राजा को सारी संपत्ति प्रभु की ही मानना होगी- मैथलीशरण महाराज

सेठ लक्ष्मणदास- पार्वती देवी स्मृति राम कथा की द्वितीय व तृतीय संध्या पर गुरूदेव कहते हैं, जब राम वनगमन वियोग में समस्त नर-नारी कहते हें। ऐसा ऐश्वर्य व सुख हमें नहीं चाहिए जहां प्रभु राम नहीं हैं, तब भरत जी कहते हैं नहीं सब संपत्ति रघुवर की हैं मैं और आप उसके रखवाले हैं।
बस यही सूत्र महाराज श्री कहते हैं समस्त पीठाधीश्वरों (पदों पर बैठे प्रमुखों) को समस्त कोसों को ग्राम-नगर-शहर राज्य व राष्ट्र के जन-जन का समझना होगा न कि अपने सुख व ऐश्वर्य के साधन के रूप में।

प्रभु करि कृपा पॉवरी दीन्हीं, यही दो खड़ाऊ हैं जिसमें प्रभु की समस्त शस्ति निहित है जिसके अवलंबन  से भरत जी ने अयोध्या की जन-जन की रक्षा की। ‘चरण पीठ करूना विधान के। जनु जुग जामित प्रजा प्रान के’ प्रभु ने पीठाधीश्वर की तरह अपनी दोनों खड़ाऊं का प्रधान सेवक बना दिया जिसके प्रेम भक्ति में भरत जी ने 14 वर्ष तक नंदीग्राम में प्रभु के रामनाथ की शक्ति से प्रजा के प्राणों व संपत्ति की रक्षा की।
गुरूदेव ने अंतिम संध्या पर कहा कि भरत जी रात्रि भर जाग कर थल व आकाश की धनुष बांड़ लेकर रक्षा करते थे जब उन्होंने देखा आकाश में कई प्रकाश बिंदु उड़ रहे हैं तब संशय हुआ कि राक्षस भी हो सकते हैं या कोई  प्रभु दूत उन्होंने बिना फल के बांड़ से उन्हें नीचे गिराया किन्तु प्रभु प्रताप से संजीवनी बूटी की प्रकाश वाला पर्वत प्रभु प्रताप के बांण से आकाश में ही रहा।
जब राम-राम सुमिरन करते हुए उन्होंने हनुमान जी को गिरते देखा तो वे विकल हो गये मैं ही सबसे बड़ा अपराधी हूँ। मेरे ही कारण प्रभु को वन जाना पड़ा और मेरे ही कारण उनके दूत को गिरा दिया, विकलता व विलाप की सीमा असीम थी। तब भरत जी ने अपनी समस्त भक्ति प्रभु को अर्पित करते हुए राम नाम का जप करते हुए कहा जो मेरी भक्ति व प्रेम आपके चरणों में सच्चा हो तो इन्हीं ठीक कर खड़ा कर दें।
यह कहते ही हनुमान जी ने उठकर सारा वृतांत बताया उसी संवाद में भरत जी ने हनुमान जी से पूछा:- प्रिय  हनुमान क्या निज दास जो रघुवंश भूषण क्या मुझे याद करते हैं, तब हनुमान जी कहते हैं हे भरत जी दिन व रात प्रभु केवल आपको याद करते हैं, बस प्रभु की यही विशेषता है कि उनके हर जन को चाहे बंदर हों-अंगद हो-हनुमान हो अयोध्यावासी हों सभी को लगता है प्रभु हमें सबसे अधिक प्रेम करते हैं।
जब हनुमान जी से प्रभु का मिलन होता है व उनके मधुर-भक्ति मय वाणी प्रभु सुनते है तब वे हनुमान जी से कहते हैं हनुमान तुम मुझे लक्ष्मण से भी दुगने प्यारे हो यही प्रभु का शील है। जब प्रभु व लक्ष्मण जी हनुमान के कंधे पर बैठकर चलते हैं तब प्रभु ने सोचा लक्ष्मण के सामने मैने हनुमान जी की इतनी तारीफ कर दी, बुरा ल लगा हो। लक्ष्मण जी से वहीं पूंछा मैने तुम्हारे सामने हनुमान जी की इतनी तारीफ कर दी तुुम्हें कैसा लगा:-
लक्ष्मण जी ने कहा आपने सही कहा मैं शेषावतार जो पृथ्वी का भार उठाएं हूँ। व हनुमान जी अपने कंधे पर ेमेरा व प्रभु आपका भी भार लिए हैं तो दो गुना तो प्रेम के अधिकारी हैं ही।
यही प्रभु का- भरत का- हनुमान का शील है संपूर्ण अंहकार रहित की हमें अहंकार मुक्त होकर दूसरे के शील ही रक्षा करनी होगी।
इसी ्रपकार प्रभु ने हनुमान से संजीवनी लाने पर हनुमान से जब पूछा हनुमार बताओ तुम्हें संजीवनी लेने और आने में क्या अनुभव हुआ। तो उन्होंने कहा प्रभु आपके वाण के प्रताप से जाने मैं तो कई बाधायें आईं लेकिन आने में भरत से मिलने पर उनके वाण के प्रभाव से आने में कोई भी बाधा नहीं आई।
यही बुद्धि के विधान हनुमान जी हैं जो ये समझ गये कि प्रभु का सर्वाधिक प्रभु को अपार सुख मिलेगा। महाराज श्री कहते हैं हमें अपने जीवन में यही साधारण सूत्र अपनाना चाहिये आप जिसे प्रसन्न करना चाहते हों, उसके सबसे प्रिय की उससे उसकी प्रशंसा करें जैसे किसी महिला से उसके बेटे की। जनोपयोगी गुरूदेव ने कई सूत्र दिये अंत में मैं यहीं कहूँगा।
‘‘ भरत चरित्र अपार, बेगि न पावहिं याथ कोई
भजिये भरत कुमान राम भगति पावहिं तुरत। ’’

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