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‘गमक’ अन्तर्गत नाटक ‘दीपदान’ का मंचन
गमक श्रृंखला की सप्ताहांत प्रस्तुतियों के अंतर्गत रवींद्र भवन में नीति श्रीवास्तव के निर्देशन में डॉ. रामकुमार वर्मा द्वारा लिखित कहानी ‘दीपदान’ की नाट्य प्रस्तुति हुई|
कहानी राजपूत रियासत पर बादशाह बहादुरशाह के आक्रमण और राजमाता के जौहर पर केन्द्रित है- सन 1535 में गुजरात के बादशाह बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर विशाल सैना और तोपों के साथ आक्रमण किया। समस्त राजपूत सरदार चित्तौड़ की रक्षा के लिए इकट्ठा हो गए| राजमाता कर्मवती ने स्थिति की देखते हुए जौहर का निर्णय लिया और राजपूत वीरों ने साका का। जौहर के पूर्व राजमाता कर्मवती ने महाराणा के उत्तराधिकारी कुँवर उदय को अपनी दासी पन्ना सोंपते हुए उसकी रक्षा का वचन लिया और १३००० हजार स्त्रियों के साथ अपने आप को अग्नि के हवाले कर दिया। राजपूतों ने भी केसरिया वस्त्र धारण किये और किले का द्वार खोल कर शत्रु पर टूट पड़े| पन्ना ने अपने पुत्र का बलिदान देकर कुँवर की रक्षा की और अपने वचन का पालन किया।
प्रस्तुति में मंच पर- महुआ चटर्जी, हिमांक तिवारी, हर्षित तिवारी, अनंदिता तिवारी, पूजा यादव, अखिलेश जैन, संजय श्रीवास्तव और वाणी श्रीवास्तव ने अभिनय किया|
मंच परे कलाकार- कहानी- डॉ. रामकुमार वर्मा, प्रस्तुति व्यवस्थापक- आशीष श्रीवास्तव, गीतकार: डॉ. राजकुमार वर्मा/ डॉ. प्रीति प्रवीण खरे, ताल वाद्य: रामबाबू, हारमोनियम- दुर्गेश केवट, प्रकाश परिकल्पना- मुकेश जिज्ञासी, मंच परिकल्पना- संजय श्रीवास्तव, मंच सामग्री एवं निर्माण- देवेन्द्र शर्मा, हर्ष दाड, दक्ष जिज्ञासी, गायन- नीति, महुआ, वाणी, हर्ष, नृत्य निर्देशन- लिपिका चक्रवर्ती एवं नृत्यांगनाएँ- अवनी, वाणी, नुपुर, मालानी, परिधी, मालानी, अक्षरा, संस्कृति और अनंदिता थीं|
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सुश्री नीति श्रीवास्तव विगत 32 वर्षों से रंगकर्म से जुडी हुई हैं, आपके प्रथम गुरु आपके पिता श्री अवदेश श्रीवास्तव हैं| पश्चात् श्री बंसी कौल व श्री आलोक चटर्जी से कला की बारीकियों को प्रवाहित किया| आपोको वर्ष 2002 में इफ़्तेख़ार स्मृति पुरस्कार हुआ| सुश्री श्रीवास्तव कई नाटकों में अभिनय के साथ कई नाटकों का सफल निर्देशन कर चुकी हैं|




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