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गोंड जनजातीय नृत्य ‘सैला’ की प्रस्तुति
एकाग्र ‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत आज आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा श्री घूमन प्रसाद कुशवाहा, दमोह का बुन्देली ‘कानड़ा’ गायन एवं श्री रूपसिंह कुशराम, डिंडोरी द्वारा गोंड जनजातीय नृत्य ‘सैला’ की प्रस्तुति हुई |
प्रस्तुति की शुरुआत श्री घूमन प्रसाद कुशवाहा एवं साथियों द्वारा बुन्देली ‘कानड़ा’ गायन से हुई, जिसमें सर्व प्रथम सुमरनी- सदा दाहिनी रईयो भवानी पश्चात् कबे मिलो रघुनन्दन माई मोहे एवं माई से ऊरन नईयां भरत मोरो आदि कानड़ा गायन और देवी गीत- माई पहले सुमर लए देवी शारदा हो माय, केवट संवाद- विनती मोरी तुमसे सौ-सौ बार है हरि एवं चोकडिया- रजऊ बोल लो नोने आदि बुन्देली लोकगीत प्रस्तुत किये |
प्रस्तुति में मंच पर- गायन में- श्री मूरत रजक एवं श्री घनश्याम पटैल, सारंगी पर- श्री हीरालाल रैकवार एवं श्री रूपसिंह कुशवाहा, खंजरी पर- श्री टीकाराम कुशवाहा, मंजीरे पर- श्री मोहनलाल पटैल, ढोलक पर- श्री भरतलाल एवं झींके पर श्री विजय वंसल ने संगत दी |
श्री कुशवाहा विगत इकत्तीस वर्षों से बुन्देली गायन करते आ रहे हैं, आप आकाशवाणी, छतरपुर के बी हाई ग्रेड कलाकार हैं, आप दूरदर्शन एवं देश के विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं |
दूसरी प्रस्तुति श्री रूपसिंह कुशराम एवं साथियों द्वारा गोंड जनजातीय नृत्य ‘सैला’ की हुई, जिसमें- तै ना ना मोर ना ना गा, नाचैय गोड़ बाजैय पेयारी तोर गीत पर सैला नृत्य की प्रस्तुति दी|
प्रस्तुति में मंच पर- श्री बिहारी सिंह, पहलवान सिंह, गूहा सिंह, शंकर सिंह, दलवीर सिंह, सुश्री बजरी बाई, देवन्ती, कविता, रागिनी आदि नर्तकों ने नृत्य किया एवं मादर वादन में- श्री शिवचरण एवं खुमान सिंह, टिमकी वादन में सतीश, शहनाई वादन में रविकांत मार्को और गुदुम वादन में मुकेश मरकाम ने साथ दिया|
यह नृत्य केवल पुरुषों द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में नर्तकों की वेशभूषा दैनिक वस्रों की रहती है। सिर के साफे में मोर पंख की कलंगी। हाथों में बनाया हुआ डंडा, फरसा, काष्ठ की बन्दक, एक दूसरे हाथ में रूमाल तथा पैरों में लोहे के पैंजने रहते हैं। नर्तक एक कतार में तथा अर्द्धगोल में नाचते हैं। एक गायक गीत उठाता है और सभी उसे दुहराते हैं। जब सैला दल अपने ग्राम से दूसरे ग्राम में नाचने जाता है तो उसको गिरदा नृत्य कहते हैं, जो वास्तव में अन्तग्राम नृत्य है। आने वाले नर्तक दल का ग्रामवासी स्वागत करते हैं, उसके साथ मिलकर नाचते हैं और तीसरे दिन कुछ ईनाम देकर विदा करते हैं।
मध्यप्रदेश के उत्तरी भाग को छोड़कर बैतूल, होशंगाबाद, छिंदवाडा, बालाघाट, शहडोल, मंडला, सागर, दमोह, सतना, खंडवा, बुरहानपुर, सीहोर, रायसेन और नरसिंहपुर जिलों में गोंड जनजाति के लोग रहते हैं। गोंड सबसे अधिक प्रभावशाली जनजाति है। गोंड प्रकृति की कोख में किसी पहाड़ी या नदी किनारे रहना पसन्द करते हैं। गोंडों के अधिकांश गाँव सड़क से दूर जंगलों में बसे होते हैं। गोंड प्रकृति प्रेमी होते हैं। प्राकृतिक जीवन उनका आदर्श जीवन है।




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