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साँची बौद्ध भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध विद्वान का दौरा
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पहले विश्वरंग अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव का आज होगा आगाज
विश्वरंग अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह की शुरुआत आज से हो रही है। इस समारोह 23 से 26 नवंबर के बीच होगा, जिसमें 12 चयनित फिल्में प्रदर्शित होंगी। देश के अलग – अलग राज्यों की भाषाओं में बनी फिल्में इस समारोह के लिए चयनित हुई है । पन्देली केको की “द व्हाइट शीट्स” आसिफ मोयल की “ज़री वाला आसमान” और गोंड जनजाति की कला पर आधारित फिल्म “द गोंड आर्ट” अनुष्ठा अग्रवाल और प्रांजल जोशी के निर्देशन में तैयार हुई है जो विभिन्न फ़िल्म समारोह में पुरुस्कृत हो चुकी है। फ़िल्म समारोह का समापन मोहम्मद
ज़ोरजिस द्वारा निर्देशित फ़िल्म रुखसाना से होगा।
कार्यक्रम की शुरुआत ‘द व्हाइट शीट’ फिल्म के साथ होगी। इसके बाद ‘द सेल्यूलाइड वोमेन’, जरी वाला आसमान, बाय दा विंडो, एंटी हीरो, सोनध्यानि, पिराना, विनसेट बिफोर नून, प्रश्न, गोंड आर्ट रुख्सना और डस्की ब्यूटी जैसी फिल्मों का प्रदर्शन होगा। मेहम्मद जोरिस और आस्था अग्रवाल जैसे कई बेहतरीन निर्देशकों ने इन फिल्मों का निर्देशन किया है। ये सभी फिल्में विभिन्न देशों में भारतीय संस्कृति की छटा बिखेर रही हैं।
फिल्म महोत्सव के अंतर्गत बहुत सारे रोचक सत्र जैसे एक्सपर्ट्स के साथ मास्टरक्लास, साहित्यिक एवं विज्ञान फिल्मों का प्रदर्शन और बहुत सारे चर्चा सत्रों का आयोजन किया जा रहा है। फिल्म महोत्सव में जाने माने नाम जैसे मोहन आगेशे, शिवेन्द्र सिंह डुंगरपुर, डॉ. बीजू दामोदरन, अतिका चौहान एवं पूबाली चौधरी जैसी हस्तियां शिरकत करेंगी।
बाल साहित्य, कला एवं संगीत महोत्सव के पहले दिन के प्रमुख सत्र
गेट सेट पेरेंट विद पल्लवी के द्वारा विश्व रंग 2020 के अंतर्गत शुरू हुआ प्रथम बाल साहित्य,
कला और संगीत महोत्सव
महोत्सव के अंतर्गत बाल साहित्य जगत के उत्कृष्ट लेखक रस्किन बांड से संवाद
मैने वयस्कों के लिए लिखते हुए अपने करियर की शुरुआत कीः रस्किन बॉन्ड
देश के प्रसिद्ध पेरेंटिंग यू ट्यूब चैनल गेट सेट पेरेंट विद पल्लवी द्वारा विश्व रंग 2020 के अंतर्गत पहले बाल साहित्य, कला और संगीत महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। 22 से 29 नवंबर 2020 के मध्य आयोजित हो रहे इस कार्यक्रम में रोजान दो सत्र रखे गए हैं। पहले दिन की शुरुआत जाने माने अंग्रेजी लेखक रस्किन बॉन्ड से बातचीत के साथ हुई। पल्लवी चतुर्वेदी ने इस सत्र में रस्किन बॉन्ड के साथ बातचीत की। 1999 में भारत सरकार ने रस्किन बॉन्ड को साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया। 2014 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनकी रचना ‘फ्लाइट ऑफ़ पिजन्स’, ‘सुज़ैन सेवेन हसबैंड’ और ‘एंग्री रिवर’ फ़िल्म का रूप ले चुकी हैं।
पल्लवी चतुर्वेदी के साथ बातचीत से पहले रस्किन बॉन्ड ने आधिकारिक रूप से महोत्सव की शुरुआत की। 7 दशकों से ज्यादा लंबे समय से अंग्रेजी साहित्य में लेखन कर रहे रस्किन बॉन्ड ने अपनी यात्रा के बारे में बताया कि 16 या 17 साल की उम्र में उनकी पहली रचना प्रकाशित हुई थी। उन्होंने बताया कि उनका उद्देश्य कभी भी अवॉर्ड हासिल करना नहीं था। वो बस लिखना चाहते थे और एक पढ़े लिखे इंसान के रूप में अपना जीवन व्यतीत करना चाहते थे। बच्चों के बारे में अपने लेखन पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि करियर के शुरुआती दिनों में वो वयस्कों के लिए लिख रहे थे। एक युवा लेखक के रूप में भी उन्होंने वयस्कों के लिए लेखन किया। 40 के पड़ाव पर पहुंचने के बाद उन्होंने बच्चों के लिए लिखना शुरू किया।
अपने पहले उपन्यास के बारे बताते हुए उन्होंने कहा कि इस उपन्यास के किरदार रस्टी का नाम अपने नाम से प्रेरित होकर रखा था। लेखन के शुरुआती दिनों में वो खुद रस्टी कहना पसंद करते थे। इन दिनों उनका अधिकतर समय बड़े शहरों में ही बीतता था। बातचीत के अंत में उन्होंने बताया कि उनकी किताब हाउ टू बी अ राइटर बच्चों के लिए काफी उपयोगी है और वो इस किताब को बच्चों देना चाहेंगे।
पपेट शो का आयोजन
अमेरिका के कैलिफोर्निया की पपेट आर्ट्स थिएटर कंपनी द्वारा पपेट शो का आयोजन किया गया। इस पपेट शो में रोचक अंदाज में ड्रैगन की पूंछ की अनूठी कहानियों को प्रस्तुत किया गया जिन्होंने बच्चों के मन को मोह लिया।
विश्वरंग के तीसरे दिन के प्रमुख सत्र
क्षमा मालवीय के कत्थक नृ्त्य के साथ शुरू हुआ विश्वरंग 2020 का तीसरा दिन
भोपाल, नवंबर 22. हिंदी और भारत की अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में रचित साहित्य और कला को नई पहचान दिलाने के लिए आयोजित किया जाने वाले ‘टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव’ (विश्वरंग) का तीसरा दिन क्षमा मालवीय के कत्थक नृत्य के साथ शुरू हुआ। प्रारंभ मंगलाचरण कार्यक्रम में क्षमा मालवीय ने शानदार कत्थक नृत्य की प्रस्तुति की। इस सत्र का संचालन विनय उपाध्याय ने किया। ‘कोविड के बाद की दुनियाः कला और संस्कृति’
इस विषय पर रविन्द्र त्रिपाठी, लीलाधर मंडलोई और संजय कुन्दन ने बातचीत की। रविन्द्र त्रिपाठी ने कहा “भारतीय परंपरा में सहृदय की बड़ी भूमिका रही है। दर्शकों के बिना आप कोई भी नाटक नहीं कर सकते। दर्शक के बिना कला कुछ भी नहीं और जब कला नहीं है तो कलाकार कैसा। इस दौर में थिएटर में वर्चुअल कार्यक्रम शुरू हुए हैं। हालांकि यह स्थायी समाधान नहीं है। अधिकतर चीजें कोरोना के खत्म होने के इंतजार में रुकी हुई हैं। किताबों का प्रकाशन भी रुका हुआ है। कई प्रोग्राम का वर्चुअल आयोजन भी हो रहा है, पर ये कितना प्रभावशाली होगा। इसका अनुमान लगाना मुश्किल है।”
विश्वरंग महोत्सव में तीसरे दिन कला और संस्कृति पर कोरोना से आए बदलावों पर चर्चा
कोरोना से सबकुछ तबाह हुआ, पर कलाकारों के पास दर्द बयां करने का मौका हैः संजय कुन्दन दर्शक के बिना कला कुछ भी नहीं और जब कला नहीं है तो कलाकार कैसाः रविन्द्र त्रिपाठी ‘टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव’ विश्वरंग में तीसरे दिन दूसरे सत्र में कोविड से आए बदलावों पर चर्चा हुई। साल 2020 कोरोना वायरस और उसके कारण हमारे जीवने में आए बदलावों के लिए जाना जाएगा। कोविड के आने के बाद हमारा जीवन काफी बदल गया है और उसमें अच्छे तरीके से ढलने के लिए हमें अपने जीवने में और भी कई बदलाव करने हैं। इन्हीं सब बातों को समझने के लिए विश्वरंग 2020 में यह कार्यक्रम रखा गया। दिन के दूसरे सत्र का संचालन जैनेन्द्र कुमार ने किया।
‘कोविड के बाद की दुनियाः कला और संस्कृति’ इस विषय पर रविन्द्र त्रिपाठी, लीलाधर मंडलोई और संजय कुन्दन ने बातचीत की। संजय कुन्दन ने कहा “कोरोना के कारण सभी कलाकार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इस महामारी के कारण सभी आयोजन ऑनलाइन करने पड़ रहे हैं और इससे दर्शकों और कलाकार की बीच की आत्मीयता और संबंध प्रभावित हुए हैं। इब कलाकार सीधे तौर पर दर्शकों की प्रतिक्रिया नहीं देख पाते। ” पिता की लाइब्रेरी में किताबों के बीच मैने लेखक बनने का सपना देखाः सुधा मेनन ‘टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव’ विश्वरंग के तीसरे दिन तीसरे सत्र में डॉ. सुलभा दीक्षित ने प्रख्यात लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता सुधा मेनन से बातचीत की। इस सत्र का संचालन विनय उपाध्याय ने किया। चर्चा से पहले विश्वरंग के सहनिदेशक सिद्धाथ चतुर्वेदी ने सभी को विश्वरंग के बारे में बताया और दोनों अतिथियों का स्वागत किया। सुलभा योगा शिक्षक होने के साथ-साथ अंग्रेजी की असिस्टैंट प्रोफेसर भी हैं। इस संवाद में सुलभा दीक्षित ने सुधा से उनके लेखकीय अनुभव जाने और समाज को मौजूदा हालातों पर चर्चा की।
सुधा ने बताया कि बचपन में उन्हें बाकी बच्चों के साथ खेलना और मस्ती करना ज्यादा पसंद नहीं था और वो स्कूल से आकर बाकी समय घर पर ही व्यतीत करती थी। इस दौरान वो लगातार किताबों के बीच रहती थी और किताबें पढ़ती रहती थी। उनके पिता ने 100 से ज्यादा किताबें अपनी लाइब्रेरी में रखी थी और इन्हीं किताबों को पढ़ते हुए उन्होंने खुद की किताब लिखने के बारे में सोचा। हम चाहें तो अपने अधिकार छोड़ सकते हैं, लेकिन कर्तव्य के साथ हम बंधे हुए हैं : नंदकिशोर आचार्य आज के समय में आक्रामक राष्ट्रवाद हमें डसे हुए हैः सुधीर चंद्रा गांधी और टैगोर दोनों महापुरुष, लेकिन दोनों के विचार समान हों जरूरी नहीं : रमेश चंद्र शाह’टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव’ विश्वरंग के तीसरे दिन चौथे सत्र में टैगोर और गांधी हमारी विश्व संवेदना विषय पर चर्चा हुई। रघुवीर चौधरी, नंदकिशोर आचार्य, सुधीर चंद्रा और रमेश चंद्र शाह इस सत्र का हिस्सा बने। सत्र का संचालन जैनेन्द्र कुमार ने किया। गांधी की कही हुई बातें याद करते हुए रघुवीर चौधरी ने अपना उद्बोधन शुरू किया। गांधी ने कहा था “जब इंद्रियों का कोलाहल खत्म हो जाता है, तब मन का संगीत सुनाई देता है।” उन्होंने आगे कहा कि गांधी और टैगोर दोनों अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को खासा महत्व देते थे। रविन्द्रनाथ के कारण ही बांग्ला भाषा को एक अलग पहचान मिल पाई है, जबकि गांधी की अंग्रेजी उनकी गुजराती से अच्छी थी, इसके बावजूद वो अधिकतर पत्रों का जवाब गुजराती में ही देते थे। नंदकिशोर आचार्य ने गांधी और टैगोर पर अपने विचार रखते हुए कहा “गांधी किसी राजसत्ता से खुदकर जोड़कर नहीं रखना चाहते थे। उनकी विरासत एक साधू की थी, एक फकीर की थी। गांधी विरासत के रूप में अपना अधूरा काम छोड़कर गए थे। हमें इसी काम को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। जैसा लोकतंत्र गांधी चाहते थे वैसा लोकतंत्र आज नहीं है। गांधी संसदीय लोकतंत्र को अहिंसक लोकतंत्र नहीं मानते थे। आज के समय में हम औपचारिक रूप से लोकतंत्र में हैं, पर हमें इसमें बदलाव करने की जरूरत है। ” फिल्मी कलाकारों के नाम रहा विश्वरंग के तीसरे दिन का छठवां सत्र
मालिनी अवस्थी के लोकगीत रहे कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण तिग्मांशू धूलिया और रघुवीर यादव ने दी बच्चों को करियर गाइडेंस ‘टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव’ विश्वरंग के तीसरे दिन छठवें सत्र में फिल्म कलाकारों से एक मुलाकात कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस सत्र में विश्वरंग के पिछले संस्करण की यादें दिखाई गई। सत्र का संचालन जैनेन्द्र कुमार ने किया। रघुवीर यादव, मालिनी अवस्थी और तिग्मांशू धूलिया इस कार्यक्रम का हिस्सा बने।
2019 से जुड़ी यादों के साथ इस सत्र की शुरुआत हुई। मालिनी अवस्थी का लोकगीत गायन इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा।
फिल्म अभिनेता रघुवीर यादव ने इस बीच बच्चों को संदेश देते हुए कहा कि कई माता पिता अपने बच्चों पर करियर चुनने का फैसला थोप देते हैं। उसे अपने मन से अपना करियर चुनने की आजादी नहीं मिलि पाती। बच्चों को अपने माता-पिता को यह समझाना चाहिए कि वो अपनी पसंद से करियर चुनना चाहते हैं और माता-पिता को भी यह बात समझनी चाहिए।
मालिनी अवस्थी ने नवरात्र में मां को समर्पित लोकगीत के साथ अपनी प्रस्तुति की शुरुआत की। उड़ी जा रे… गाने के साथ उनका कार्यक्रम शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने लगना वही जैसे गीत भी गाए। गीतों के बीच उन्होंने देशभक्ति के मायने समझाने की कोशिश भी की। उन्होंने बताया कि पेड़ लगाना और बांध बनाना भी देशभक्ति का काम है, देशसेवा का काम है। वह हर काम जो देशहित में किया गया हो, वो देशहित का काम है। इस बीच उन्होंने हिरण और हिरणी के संवाद के जरिए गीत भी मुशायरे से राहत इंदौरी को श्रद्धांजलि संस्मरण में मुशाहरा सत्र का आयोजन किया गया। इसमें प्रसिद्ध शायर रहे राहत इंदौरी को श्रद्धांजलि दी गई जो
पिछले वर्ष विश्वरंग के अंतरराष्ट्रीय मुशायरा का हिस्सा रहे थे। मुशायरे में शीनकाफ निजाम, राजेश रेड्डी, वसीम बरेलवी, अज्म शाकिरी, शकील आजमी, मदनमोहन दानिश, नुसरत मेंहदी, परवीन कैफ, बद्र वास्ती शामिल रहे। इसमें डॉ. परवीन कैफ हम क्या उन्हें जरा आजमाने लगे, वह भी आने लगे और खत भी आने लगे… मुझे तुम सिखाने लगे शायरी, खबर है तुमको किस घराने की हूं…. को पढ़ा, मदन मोहन दानिश के कुछ शेर… जिंदगी में बेसबब कुछ भी नहीं होता है कोई चेहरा है तो आईना रहता हूं मैं… को पढ़ा, शकील आज़मी ने पढ़ा कि.. शाम होने को है घर जाते हैं, बुलंदी से उतर जाते हैं और जिंदगी सामने मत आया कर, हम तुझे देख कर डर जाते हैं। हम क्या देखें थके हारे लोग ऐसे सोते है कि मर जाते हैं रात मरहम लगाती है शकील और हम जख्मों से भर जाते हैं। इकबाल असर ने पढ़ा मेरा नाम उर्दू में खुसरो की पहेली




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