शब्द ब्रह्म है और शब्द की अधिष्ठात्री सरस्वती है: गिरेन्द्र सिंह भदोरिया

एकाग्र ‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत आज साहित्य अकादमी द्वारा श्री गिरेन्द्र सिंह भदोरिया का ‘हिंदी कविता का सौंदर्य भाव’एकाग्र व्याख्यान एवं श्री आदित्य सिंह गौर, भोपाल द्वारा ‘गायन’ की प्रस्तुति दी गई | प्रस्तुति की शुरुआत श्री भदोरिया के व्याख्यान से हुई, जिसमे उन्होंने कहा- पंडित राज जगन्नाथ ने रसगंगाधर में काव्य का लक्षण बताते हुए लिखा है “रमणीयार्थ प्रतिपादक: शब्द: काव्यम्। “अर्थात् रमणीय अर्थ को देने वाले शब्द को ही काव्य कहते हैं। उक्त लक्षण पर विचार करते हुए मेरा मन शब्द की रुचि भरी सार्थकता पर केन्द्रित रहा है। शब्द ब्रह्म है और शब्द की अधिष्ठात्री सरस्वती है।

ध्वनि और वाणी को छोड़कर संगीतवर्णादि शब्द की माया हैं। अतः शब्द सागर में डूबने की साधना शक्ति पाने के लिए ही मैं अपनी तपस्या कर रहा हूं और अपनी रचनाओं को इस का फल मानता हूं …। कविता और काव्य में बहुत बड़ा अन्तर है। कविता अंश है और काव्य अंशी। काव्य फल है और कविता उसका अर्क। गीत तो कविता का भी अर्क है। काव्य की अन्य विधाएं मस्तिष्कीय उत्पाद है वहीं कविता पूरी तरह हार्दिक है। गीत के अधिक समीप होने से तो और भी अधिक हार्दिकी है । केवल अभिधा के बल पर भी श्रेष्ठ काव्य का सृजन संभव है किन्तु मात्र अभिधा में कविता सम्भव ही नहीं है उसमें लक्षणा व व्यंजना की उपस्थिति आवश्यक है। आजकल तथा कथित यथार्थवादी कविता की बात चलती है, इस पर मेरा मानना है काव्य तो यथार्थवादी हो सकता है किन्तु कविता कल्पना युक्त होने से यथार्थवादी हो ही नहीं सकती। छन्द मुक्त रचना मेरे मतानुसार काव्य तो है किन्तु वह कविता नहीं।संसार की सर्वाधिक चामत्कारिक व प्रभावकारी शक्तियों में काव्य है किन्तु कविता के प्रभाव की तो तुलना ही नहीं हो सकती है,कविता सारों का भी सार है।एक अच्छी रचना संवेदनहीन प्राणियों को आन्दोलित कर देती है।वह क्रान्तिकारिणी भी है शान्तिकारिणी भी।जो संवेदना के रहते संसार की किसी भी भाषा में रही है रहेगी भी, सरस्वती की इस सर्वाधिक मुखरा बेटी के नवावतरण के लिए प्रार्थनारत हूं। स्वयं को कवि मानने में मुझे संकोच होता है परन्तु कविता का विद्यार्थी कहने में गर्व की अनुभूति करता हूं।सीख रहा हूं और मन में सीखने की उद्दाम ललक सदैव भरी रहती है। श्री भदोरिया ने अपने सभी प्रेरणाश्रोत वरिष्ठजनों को नमन करते हुये अपनी वाणी को विराम दिया |  

श्री भदोरिया ने हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य में एम. ए. बीएड किया है, देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं एवं आलेखों का प्रकाशन तथा अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में भाग ले चुके हैं। 

श्री आदित्य सिंह गौर, भोपाल द्वारा ‘गायन’ प्रस्तुति में- अरुण यह मधुमय देश हमारा -श्री जयशंकर प्रसाद, शीतल समीर आता है- श्री जयशंकर प्रसाद, बहुत दिनों से हुई प्रतीक्षा- सुश्री सुभद्रा कुमारी चौहान, जैसे चीटियां लौटती हैं बिलों में – श्री सोमदत्त, कोई नही है ज़िम्मेदार– श्री केदारनाथ सिंह, यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो- श्री सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, छू गया है कौन मन के तार – डॉ. हरिवंशराय बच्चन,  अब तुम्हारे बिन कहीं लगता नही है मन– श्री नीरज आदि का गायन प्रस्तुत किया |  

श्री गौर ने मुंबई में पाँच वर्ष  तक ख्यात संगीत गुरु श्री महबूब खान से शास्त्रीय और सुगम संगीत की शिक्षा प्राप्त की एवं कई प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुति दी, डीडी उर्दू के जुनून ए ग़ज़ल प्रोग्राम में इन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया, प्रसार भारती से बी हाई ग्रेडेड श्री गौर आईसीसीआर में भी इलीट पैनल में एंपेनल्ड हैं | 

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