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सूफ़ियाना मौसिकी से महका ‘विश्वरंग’
एक ओर अमन, एकता और आपसदारी का रोमांच जगाता संगीत तो दूसरी ओर नई चुनौतियों के बीच उम्मीद और हौसले को थामकर रंगमंच पर लौटने के सबक। रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक परिसर में ‘विश्वरंग 2020’ के तहत चल रही गतिविधियों ने गुरूवार (5 नवंबर) को कुछ इस तरह करवट ली।
टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केन्द्र द्वारा इफ़्तेख़ार क्रिकेट अकादेमी के सहयोग से आयोजित तीन दिवसीय नुक्कड़ नाट्य समारोह एवं रंग संगीत की महफिलें इन दिनों अभिनय, संवाद और गायन-वादन के मुख्तलिफ रंगों से रौशन हैं। दूसरे दिन की सभा का आकर्षण आलोक चटर्जी के निर्देशन में म.प्र. नाट्य विद्यालय की प्रस्तुति ‘कल का रंगमंच’, मो. साज़िद के रंग बैंड का सूफी संगीत, श्रुति अधिकारी का संतूर वादन और चैताली शेवलीकर का वायोलीन वादन रहा। कार्यक्रम का प्रसारण विश्वरंग के वर्चुअल प्लेटफार्म यू ट्यूब और फेसबुक पर किया जा रहा है। कलाकारों का स्वागत कुलाधिपति संतोष चैबे, टैगोर कला केन्द्र के निदेशक विनय उपाध्याय तथा कोर रिचर्स ग्रुप टैगोर विश्वविद्यालय के संयोजक प्रो. वी.के. वर्मा ने किया।
महफिल का आगाज़ प्रतिभाशाली युवा संगीतकार चैताली ने वायोलीन पर सद्भाव की प्रेरणादायी धुनें बजाकर किया। सुरों के इस गुलदस्ते में टैगोर का कालजयी गीत ‘एकला चलो रे’ से लेकर बनारसी धुन, तराना और मीरा का भजन ‘राम रतन पायो’ अपनी रंग-ओ-महक लिए शामिल थे। वायोलीन के तारों पर बहते इस सुरीले अहसास में नया पहलू जोड़ा श्रुति अधिकारी ने। संतूर जैसे मीठे-कोमल साज़ पर जैसे ही उन्होंने राजस्थानी मांड ‘पधारो म्हारे देस’ की बंदिश बजायी माहौल प्रेम और आत्मीयता के राग-रंग में डूब गया। यह सिलसिला बापू के प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ से गुजरता पहाड़ी धुन पर जाकर थमा। इन दोनों कलाकारों के साथ रामेन्द्रसिंह सोलंकी की सधी हुई संगत ने लय-ताल का करिश्माई अंदाज़ दिखाया। साज़ों की सुरीली दस्तक के बाद मौसिकी की इस महफिल में चार चांद लगाने युवा फ़नकार मो. साज़िद और आमिर हाफिज़ अपने साथी-संगतकारों के साथ मंच पर नमूदार हुए। अपनी गायिकी में सूफ़ियाना असर लिए इस जोड़ी ने हज़रत अमीर खुसरो के मशहूर कलाम चुने। ‘दमादम मस्त कलंदर’ और ‘आज रंग है’ जैसी मशहूर बंदिशों का सुरीला परचम फ़िज़ाओं में लहराया तो संगीत के कद्रदान भी थिरक उठे।
नुक्कड़ शैली में ‘कल का रंगमंच’ प्रस्तुत करने म.प्र. नाट्य विद्यालय के विद्यार्थी शरीक हुए। वरिष्ठ रंगकर्मी आलोक चटर्जी द्वारा निर्देशित इस लघु नाटक में कोविड-19 के दौरान उभरी नई चुनौती के बीच रंगमंच की लौटती उम्मीदों की आहट थी। सशक्त संवाद, अदाकारी और सामूहिक रंग उर्जा से तैयार इस नए प्रयोग में तनवीर अहमद, सुशीलकांत मिश्र, रविराव, सुरेन्द्र वानखेड़े और रहिमुद्दीन का रचनात्मक सहयोग रहा।
www.vishwarang.com पर फ्री रजिस्ट्रेशन करके आप इस सत्र में भाग ले सकते हैं। यह कार्यक्रम http://festival.vishwarang.com/live/ और YouTube चैनल के साथ-साथ विश्वरंग के सभी सोशल मीडिया पेजों पर भी लाइव स्ट्रीम होगा।




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