धनुष यज्ञ, रामविवाह और कैकेयी दशरथ संवाद प्रसंगों का मंचन

एकाग्र ‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत  पाँच दिवसीय रामलीला के दूसरे दिन 21 अक्टूबर को रामलीला के दूसरे दिन धनुष यज्ञ, रामविवाह और कैकेयी दशरथ संवाद प्रसंगों का मंचन किया गया। इन प्रसंगों में मिथिला के राजा जनक अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर के लिए धनुष यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं और राजा जनक यज्ञ में पधारे सभी राजाओं को सामने ये शर्त रखते हैं की जो भी राजा इस शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, सीता उसी के गले में वर माला डालेगी|

दरवार  में उपस्थित राजाओं में से कोई कोई भी शिव धनुष को अंगुल मात्र भी नहीं उठा सके तब गुरु की आज्ञा से राम धनुष का भंजन करते हैं और राम-सीता विवाह संपन्न होता है| अगले प्रसंग में अयोध्या के राजा दशरथ और कैकई संवाद को मंचित किया गया| कैकई ने दो वरदान जो उचित समय के लिये सुरक्षित रखे गए थे राजा दशरथ से मांगे जिसमें राम को चौदह वर्ष का वनवास और भरत को अयोध्या का राजा बनाना| यह सुनकर राजा दशरथ कैकई से भावपूर्ण अनुनय-विनय करते हैं लेकिन कैकई के हट को मानकर द्रवित ह्रदय से दोनों वरदान देते हैं | मध्यप्रदेश की इस पारंपरिक लीला मण्डली के साथ समकालीन नाट्य प्रयोगों को जोड़ते हुए संवाद, अभिनय, वेशभूषा, रंगभूषा, प्रकाश, मंचीय सज्जा आदि का कार्य परिष्कार की दृष्टि से किया जा रहा है| ख्यात रंगकर्मी, निर्देशक श्री जयंत देशमुख, मुंबई इन कलाकारों के साथ कथा मंचन के पूर्व अभ्यास और संवाद के माध्यम से परिष्कार का कार्य कर रहे हैं |      

जनजातीय संग्रहालय के मुक्ताकाश मंच पर नवाचार और नयनाभिराम दृष्य बिम्बों में प्रस्तुत हो रही इस रामलीला को दर्शकों द्वारा काफी सराहा जा रहा है| दर्शकों ने करतल ध्वनि से कई बार कलाकारों का उत्साह वर्धन किया|  

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