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लोकगायिका संजो बघेल द्वारा ‘लोकगायन’ की प्रस्तुति
कला विविधताओं के प्रदर्शन ‘गमक’ के छठवे दिवस, आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा आज सुप्रसिद्ध लोकगायिका सुश्री संजो बघेल, जबलपुर द्वारा अपने साथी संगत कलाकारों के साथ ‘लोकगायन’ की प्रस्तुति दी |
कार्यक्रम की शुरुआत गणेश भजन- आजाओ गणराज से हुई, अगली प्रस्तुति देवी भजन – कबूतर ले जा रे, नर्मदा भजन- नर्मदा मैया तेरी हो रही जय जयकार, राम भजन- मागर माटी राम की चलो देखन चलिये, राम रघुरैया तेरी हो रही जय जयकार, देवी जश- सुनियो अरज देवी शारदा हो माँ, मोसे सीडियां चढ़ी न जाये मैया, आल्हा में माँ शारदा का एवं माँ वैष्णो का आल्हा , कृष्ण भजन- बैठी रई हवेली खोलके द्वार, लय डारे प्राण, देवी भजन- जग रूठे तो रूठे, शिव भजन- ऐसे कोऊ के नई री और रईया गाना आदि गीत प्रस्तुत किये और शिव भजन-लुटिया में लाई भोला भंग से अपने प्रस्तुति का समापन किया|
सुश्री बघेल ने अपने गायन की शुरुआत लगभग 9 वर्ष की आयु में की, मैहर की माँ शारदा को अपना गुरु मान कर सुरों की साधना करते हुए बुन्देली और हिंदी के लगभग 10,000 से अधिक गीत गा चुकी हैं, वर्ष 2005 में भोला नई माने और वर्ष 2006 में ‘शारदा माँ का आल्हा’ रिलीज़ हुआ जिशे देश के कोने-कोने में सराहा गया| अनेक म्यूजिक कम्पिनियों द्वारा आपके भजन- एलवम रिलीज़ हुए हैं और अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा आपको सम्मान प्राप्त है|
समूह निर्देशन श्री राजेंद्र राजपूत, सूत्रधार श्री रविन्द्र वैष्णव, संगीत संयोजन श्री राजेश विश्वकर्मा, तबले पर श्री अनुराग बैन, ढोलक पर श्री सतीश विश्वकर्मा, ऑक्टोपैड पर श्री मनीष लखेरा एवं सहगायन में सुश्री शिल्पी बघेल और रोशन शर्मा ने संगति दी|




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