सिंधिया ने जमीन के खेल की पूर्ति नहीं होने पर कमलनाथ सरकार गिराईः कांग्रेस

कांग्रेस के वरिष्ठतम नेता, प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मुरारीलाल दुबे और प्रदेश कांग्रेस मीडिया प्रभारी (ग्वालियर-चम्बल संभाग) के.के. मिश्रा ने आज ज्योतिरादित्य सिंधिया परिवार पर फिर हमला बोलते हुए सीधा आरोप लगाया कि जब मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सिंधिया के जमीनों के खेल की पूर्ति करने से मना कर दिया, तो उन्होंने एक निर्वाचित सरकार को भाजपा के सहयोग से गिराकर प्रदेश में राजनैतिक और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गहरा अघात किया।

कांग्रेस नेताओं ने कहा कि यदि ये आरोप गलत है तो सिंधिया की बदौलत मुख्यमंत्री पद पर अलोकतान्त्रतिक ढंग से काबिज हुए शिवराजसिंह चौहान बताऐं कि उन्होंने शपथ लेने के तत्काल बाद अपने पहले ही राजनैतिक निर्णय के रूप में सिंधिया के विरुद्ध ईओडब्ल्यू, भोपाल में दर्ज प्रकरणों को तत्काल प्रभाव से समाप्त करने के आदेश जारी क्यों जारी किये?
अपने आरोपों को स्पष्ट करते हुए नेताओं ने कहा कि सिंधिया यह भी स्पष्ट करें कि 15 अगस्त,1947 को अन्य रियासतों की तरह ग्वालियर का विलीनीकरण भारतीय संघ में हुआ था तब इसके साथ ही कोवेनेन्ट भी तैयार किया गया उसके आर्टीकल के अनुसार राजा-महाराजाओं से उनकी व्यक्तिगत सम्पति की सूची 01.08.1948 तक मांगी गई थी। जिसे 13.08.1948 को भारत सरकार द्वारा म.प्र के तत्कालीन प्राइम मिनिस्टर लीलाधर जोशी को 16.08.1948 को भेजा गया, इसके पश्चात 01.07.1949 को इस सूची पर अंतिम मोहर लग गई। तत्पश्चात 29 जुलाई 1949 द्वारा इसे प्रकाशित कर मेमोरेंडम के साथ सभी मध्य भारत के विभागों को इस निर्देश के साथ भेज दी गई थी कि संलग्न सूची के साथ उन्हें कब्जा दे दिया जाए, शेष सम्पति मध्य भारत शासन में विलीन कर दी जाऐ। ज्योतिरादित्य सिंधिया अब बताऐं कि इनवेन्टरी में वर्णित इन सम्पति के अलावा आज दिनांक तक उन्होंने कितनी सम्पति कब-कब और किन-किन तरीकों से अर्जित की?
नेताओं ने कहा कि क्या यह झूठ है कि उक्त सम्पति के अलावा जब सिंधिया परिवार ने जमीनों के अवैध कब्जों का खतरनाक खेल प्रारम्भ किया, इसकी शिकायतों के उपरांत प्रदेश तत्कालीन एडीशनल सेक्रेटरी बीके दुबे ने उन शिकायतों को सही पाते हुए केन्द्र सरकार से इस आशय का परामर्श मांगा कि प्लान और नक्शों में सामने आये अन्तर की स्थिति में किसे सही माना जाये? उस पर केन्द्र ने राज्य को निर्देश दिया कि इन स्थितियों में इनवेन्ट्री को ही मूल दस्तावेज माना जायें और इस निर्णय पर भारत सरकार ने राज्य सरकार के विधि विभाग के अभिमत से अपनी सहमति जताई।
नेताओं ने कहा कि सिंधिया यह बताऐं कि वे खसरा नं. जो वर्ष 1989 तक सरकारी दस्तावेजों में नजूल भूमि के नाम पर रिकोर्ड दर्ज थे वे आज आपके विभिन्न पंजीकृत/अपंजीकृत ट्रस्टों परिजनों के नाम पर कैसे तब्दील कैसे हो गये? ग्राम महलगाव, पटवारी हल्का नं 42, राजस्व निरीक्षक सर्कल नं. 3 लश्कर तहसील व जिला ग्वालियर के संलग्न सर्वे नं एंव रकवा सूची सलंग्न है।
नेताओं ने कहा यह कि करोडो-अरबों रूपयों के हुए इस बडे खेल में सिंधिया परिवार के राजनैतिक रसूख और नौकरशाहों के कुत्सित गठबंधन का मिला-जुला षड्यंत्र है जिसे मिलजुल कर अंजाम दिया गया! इससे स्पष्ट होता है कि ‘सिंधिया परिवार की रुचि जनसेवा में न होकर भूमि के बडे खेलों में रही है।’ नेताओं ने एक बडा आरोप लगाते हुए यह भी कहा कि इस मिलेजुले खेल में जिन ट्रस्टों का उपयोग किया गया है उनमें से कई ट्रस्ट तो पंजीकृत भी नहीं है। सूचना का अधिकार कानून-2005 के अन्तर्गत सामने आई जानकारी चैंकाने वाली है, जिसमें यह पूछा गया था कि सिंधिया घराने के आधिपत्य वाले वर्ष 1968 से 2005 तक संचालित विभिन्न 21 ट्रस्टों पदमाराजे सिंधिया, ऊषाराजे सिंधिया, बसुन्धराराजे सिंधिया, कमलाराजे सिंधिया, यशोधराराजे सिंधिया, मन्नूमहल, जयविलास, जयाजीराव सिंधिया, जनकोजीराव, ज्योतिरादित्य सिंधिया, गोरखी ट्रस्ट, चिनकोराजे, रंगमहल, महादजी सिंधिया, सिंधिया, देवस्थान, मातोश्री गजराराजे, महारानी जीजाजी, गजराराजा सिंधिया, समुद्र महल बाम्बे, सरमाराजे, सिंधिया रूलर एंव डवलपमेंट ट्रस्टों में कितने ट्रस्ट पंजीकृत है?, कहां है? उनके पते भी क्या है? इस पर पहले तो जानकारी देने में टालमटोलम किया गया! बमुश्किल अनुविभागीय अधिकारी ग्वालियर ने 14 अप्रैल 2011 को जो जानकारी दी है उसके अनुसार 21 ट्रस्टों में से सिर्फ 4 ट्रस्ट ही पंजीकृत पाये गये है जो 1. महादजी चेरीटेबिल ट्रस्ट, रंगमहल चेरिटेबल ट्रस्ट, ज्योतिरादित्य चेरीटेबिल ट्रस्ट ओर गोरखी चेरीटेबिल ट्रस्ट है जो एक ही दिनांक 3.11.2003 को पंजीकृत होकर पंजीयन क्रमांक क्रमशः 171,172,173, और 174 पर दर्ज है। यदि अन्य ट्रस्टों का पंजीयन ही नहीं है तो उनके नाम पर लाखों-करोड़ों रूपयों की भूमि पर अवैध कब्जे, उनके नामांतरण और सौदे कैसे हुए?
कथित जनसेवक सिंधिया यह भी बताये:-
कांग्रेस नेताओं ने अपने स्वयं को जनसेवक बताने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया से यह भी पूछा हैं कि यदि वे और उनका परिवार राजनीति को जनसेवा का माध्यम मानता आया है तो वे कृपापूर्वक यह भी बतायें कि ग्वालियर शहर के मध्य-क्षेत्र स्थित बेशकीमती शासकीय बिक्रित भूमि ग्राम-महलगांव हल्का नं 42/66 में एक साथ एक ही जगह स्थित भूमियों को अलग-अलग दरों पर प्रति बीघा क्यों और किस लिए बेचा गया? मसलन, यहां स्थित 3 बीघा 9 बिस्ता भूमि जिसे 30 लाख रूपये प्रति बीघा की दर से 94 लाख में ज्योतिरादित्य ट्रस्ट द्वारा बेचा गया, 1 बीघा 5 बिस्ता भूमि को कुल 18 लाख 66 हजार 666 रूपये प्रति बीघा की दर से कुल 28 लाख रूपयें में सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट द्वारा बेचा गया, 1 बीघा 3 बिस्ता भूमि को 20 लाख रूपये प्रति बीघा की दर से कुल 26 लाख रूपयों में सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट, श्री ज्योतिरादित्य द्वारा बेचा गया। इसी प्रकार विक्रेता माधवीराजे सिधिंया, ज्योतिरादित्य सिंधिया, और चित्रांगदा राजे द्वारा नारायण बिल्डर्स को 4 बीघा 8 बिस्ता भूमि कुल 1 लाख 25 हजार प्रति बीघा की दर से मात्र 6 लाख रूपयों में बेची गई। यहां सिंधिया परिवार की राजनैतिक पृष्ठभूमि का आर्थिक अपराध इस तरह उजागर हो रहा है कि उक्त हल्का नं. की शासकीय भूमि विक्रेता के रूप में माधवीराजे सिंधिया, ज्योतिरादित्य सिंधिया और चित्रांगदा राजे ने राजस्व में फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से प्रकरण क्रमांक- 90/05-06/अ 6/18.04.2006 को दर्ज करवाया उसे मात्र 1 माह बाद ही दिनांक 05 मई 2006 को उक्त क्रेताओं को बेच दिया। इस षड्यंत्र के पीछे की कहानी/ अपराधिक कृत्य खोज का विषय है? (दस्तावेज संलग्न)
प्रदेश कांग्रेस की मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चैहान से मांग है कि वे यदि भू-माफियाओं के खिलाफ कार्यवाही करने के वास्तविक पक्षधर है तो उन्हें उपरोक्त प्रमाणित तथ्यों की सूक्ष्म जॉंच कराकर जनसेवा के नाम पर अपनी बगल में बैठने वाले राजनैतिक लुटेरों को बेनकाव करना चाहिए।

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