आजीविका मिशन से 25 लाख महिलाएँ बनीं आत्म-निर्भर

आजीविका मिशन से प्रदेश की सभी वर्गों की महिलाओं को संगठन में शक्ति का मंत्र मिल गया है। आज प्रदेश की लगभग 25 लाख महिलाएँ 2.17 लाख से अधिक समूहों में संगठित हुई हैं। इनमें से 1.69 लाख समूहों को बैंकों के माध्यम से 2221 करोड़ का ऋण मुहैया करवाया गया है। समूहों की महिला सदस्य समाज में आर्थिक आत्म-निर्भरता की मिसाल बन रही हैं।

लाखों महिलाओं में टीकमगढ़ की ममता अहिरवार, झाबुआ की मडीबाई, सीधी की फूलकुमारी, शहडोल की सविता यादव ने आत्म-निर्भरता के नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं।

आजीविका की नेपकिन के सहारे महिलाओं को जागरूक कर रही ममता: टीकमगढ़ जिले की ग्राम चरपुवां निवासी ममता अहिरवार ने राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर न केवल सेनेटरी नेपकिन विक्रय का व्यवसाय स्थापित किया, बल्कि पिछड़े क्षेत्रों में महिलाओं-बालिकाओं को रूढ़ीवादी सोच से उभार कर स्वास्थ्य के प्रति जागरूक भी बना रही है।

स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद ममता ने सब्जी, मनिहारी और नेपकिन निर्माण और विक्रय का काम अपनाया। इसके लिए समूह से 30 हजार का कर्ज लिया। सेनेटरी नेपकिन का काम शुरू करने में महिला बाल विकास, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग से सहयोग लिया। पहले बच्चियों को जागरूक करने का अभियान चलाया, फिर फोलोअप किया। ममता की मेहनत का ही परिणाम है कि उसके साथ अन्य स्व-सहायता समूह इस काम में लगे हैं। परिणाम स्वरूप ग्रामीण अंचल में 60-70 प्रतिशत महिलाएँ आजीविका की नेपकिन इस्तेमाल कर रही हैं।

 

आजीविका के पंचसूत्र से आत्म निर्भर बनी फूलकुमारी: सीधी जिले में विकासखण्ड कुसमी के ग्राम कुरूचु की फूलकुमारी सिंह ने आजीविका के पंचसूत्र को आत्मसात कर अपने जैसी 12 महिलाओं को स्वावलम्बी बनाया है। मेहनत-मजदूरी कर जीवन-यापन करने वाली फूलकुमारी को आजीविका मिशन की टीम से स्व-सहायता समूह की जानकारी मिली, तो उसने अपने जैसी 12 महिलाओं को संगठित कर शांति स्व-सहायता समूह का गठन किया। बचत से शुरू हुई इस प्रक्रिया से समूह कुछ ही दिन में अपने सदस्यों की मदद करने लगा।फूलकुमारी ने भी पहले 2 हजार रूपये सब्जी के व्यवसाय, फिर 5 हजार और 10 हजार रूपये कपडे़ के व्यवसाय के लिए ऋण लिया। अब वह हाट-बाजार में सब्जी और कपड़े दोनों की दुकान लगाती है और आराम से 12 से 15 हजार रूपये प्रति माह कमा रही है।

मडीबाई बनी तीन बैंकों की एजेंट: झाबुआ जिले के रानापुर ब्लाक के ग्राम सरसवाट की स्नातक मडीबाई द्विव्यांग होने के बावजूद शासकीय नौकरी नहीं पा सकी, तो उसने मुख्यमंत्री स्व-रोजगार योजना के माध्यम से प्रशिक्षण प्राप्त किया। अब वह तीन बैंकों के एजेन्ट के रूप में काम कर रही है। पिता के देहान्त के बाद कठिन दौर में स्नातक की शिक्षा पूरी की। उसे एन.आर एम.एल. की जानकारी मिली। इससे जुड़ी, तो उसका चयन बैंक सखी के रूप में हो गया। मुख्यमंत्री आर्थिक कल्याण योजना में उसे बैंक ने एक लाख ऋण भी दिया। इससे मडीबाई ने बैंकिंग कार्य के लिए लेपटॉप, इन्टरनेट कनेक्टीविटी लेकर कियोस्क सेंटर प्रारम्भ कर दिया। बैंक ऑफ बडौदा के कियोस्क सेंटर से उसे 10 हजार रूपये प्रति माह मिलने लगा है। उसकी लगन-मेहनत देख उसे नर्मदा झाबुआ बैंक, और भारतीय स्टेट बैंक ने भी अपनी बैंक सखी बना लिया है। वहअभी तक एक करोड़ तक का ट्रान्जेक्शन कर चुकी है।

आर्थिक आत्म-निर्भरता से बढ़ा सविता का आत्म-विश्वास: शहडोल जिले में विकासखण्ड जयसिंहनगर के ग्राम लखनौटी की सविता यादव भी राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर समूह की सदस्य बनी और फिर आरसेटी के माध्यम से सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण प्राप्त किया। अब वह बैंक से 10 हजार का ऋण लेकर अपना सिलाई कढ़ाई केन्द्र और किराना दुकान चला रही है। इससे सविता प्रति दिन 200 से 300 रूपये कमा रही है। अब वह किसी पर निर्भर नहीं है। आर्थिक आत्म-निर्भरता से उसका आत्म विश्वास भी बढ़ा है।

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