भारतीय लेखन शास्त्र पुरातन, नई दृष्टि से शोध, अध्ययन की आवश्यकता

सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में प्राचीन लिपियों, लेखन तकनीक, प्रस्तर एवं शिलालेख अध्ययन एवं शोध विधियों पर सात दिवसीय कार्यशाला का आज शुभारंभ हुआ। 9 मार्च तक चलने वाली इस कार्यशाला में भारतीय पांडुलिपि शास्त्र की विशेषता, लेखन एवं छपाई की तकनीकों, ब्राह्मी लिपि एवं अन्य लिपियों की जानकारी एवं पढ़ने की तकनीकों पर विस्तृत कार्य होगा।

उद्घाटन सत्र में कोलकाता विवि में संस्कृत विभाग की प्रमुख रही प्रो रत्ना बसु ने कहा कि भारतीय चेतना जानने, ढूंढ़ने और प्रमाण की रही है। ग्रंथ संपादन शास्त्र की उपयोगिता बताते हुए उन्होने कहा कि अब सिद्ध हो चुका है कि भारत में लेखन की जानकारी अफ्रीका से नहीं आई बल्कि पाणिनी और उसके पहले से मौजूद रही है। उन्होने बताया कि नवीनतम शोध से सिद्ध हो चुका है कि पाणिनी  छठवी शताब्दी ईसापूर्व हुए थे। प्रो बसु ने कहा कि भारत में प्राकृतिक साधनों से निर्मित लेखन सामग्री का पूरा विकसित कुटीर उद्योग था। उन्होने पांडुलिपियों की शिक्षा आधारित पर्यटन का सुझाव देते हुए कहा कि आज ज़रुरत है कि हम नई दृष्टि से अपने ग्रंथों, पांडुलिपियों, शिलालेखों को देखे और उसमें घुसे पश्चिम प्रभाव को हटाकर सत्यरुप का निरुपण करें।

उद्घाटन वक्तव्य देते हुए सांची विवि के कुलसचिव श्री राजेश गुप्ता ने कहा कि देवनागरी लिपि में ज्ञ अंतिम शब्द है जो ज्ञात को प्रस्तुत करता है अर्थात ज्ञात के उपरांत अनुभूति का पर्याय ही ज्ञान है। इसे देखने और दिखने में विभाजित किया जा सकता है, जिसमेंदेखना मैं की अभिव्यक्ति है और दिखना अनुभव को दर्शाता है। उन्होने कहा कि रुप,नाम, विचार, शब्द की आवश्यकता है और शब्द से अर्थ निकलता है, अर्थ से समझ निर्मित होती है और समझ से सत्य की अनुभूति होती है। श्री गुप्ता ने कहा कि ज्ञान विचार प्रधान है जबकि लोक व्यवहार भाव प्रधान है और शायद इसीलिए लोक व्यवहार के दोहे, लोकोक्तियां, ज्ञान के मंत्र, शास्त्र और काव्य से ज्यादा प्रचलित है।

जगन्नाथ संस्कृत विवि, पुरी के प्रो बृजकिशोर स्वाइन ने कहा कि भारतीय शोध परंपरा काफी प्राचीन है एवं इसके उद्घाटन के लिए ग्रंथ प्रकाशन पर सांची विवि को पहल करना चाहिए। उन्होने ग्रंथ संपादन पर कार्यशाला का भी सुझाव दिया। कार्यक्रम की अध्यक्ष और पुणे विवि में संस्कृत विभाग की प्रमुख रही प्रो निर्मला कुलकर्णी ने इस मौके परपांडुलिपि शास्त्र को स्वतंत्र विज्ञान के रुप में स्थापित करने की आवश्यकतानिरुपित की। कार्यक्रम में स्वागत वक्तव्य प्रो वैद्नाथ लाभ ने एवं अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन प्रो नवीन मेहता ने किया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. विश्वबंधु द्वारा किया गया। 

कार्यशाला में जवाहर लाल नेहरु विवि, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, डॉ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,सागर, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा, हेमवंती नंदन बहुगुणा विवि,गढ़वाल, झारखंड केंद्रीय विवि, जगन्नाथ संस्कृत विवि, पुरी एवं बरकतुल्ला विवि भोपाल के 40 शोधार्थी शामिल है। आमन्त्रित विद्वानों में कोलकाता विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. रत्ना बसु, जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय उड़ीसा से प्रो. ब्रज किशोर स्वाई, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी,पूना विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की प्रो. निर्मला कुलकर्णी, गुजरात विश्वविद्यालय की प्रो. सुनंदा शास्त्री एवं वैदिक विद्वान डॉ सुद्युम्नाचार्य शामिल है।

सांची विश्वविद्यालय प्रयासरत है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में जो भी लिखित साहित्य,मानवीय ज्ञान के अभाव में अब तक अनुवादित या लिपिबद्ध नहीं हो सकी है, उसे विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया जाए ताकि ज्ञान का एक नया स्त्रोत खुल सके।

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