स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘ध्वजारोहण’

75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में वरिष्ठ भील जनजातीय चित्रकार पद्मश्री श्रीमति भूरीबाई ने ध्वजारोहण किया| इस अवसर पर निदेशक डॉ. धर्मेन्द्र पारे, उप निदेशक श्री अनिल कुमार, संग्रहाध्यक्ष श्री अशोक मिश्र, जनजातीय कलाकार और अन्य अधिकारी/ कर्मचारी उपस्थित रहे| 

मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग की विभिन्न अकादमियों द्वारा कोविड-19 महामारी के दृष्टिगत बहुविध कलानुशासनों की गतिविधियों पर एकाग्र श्रृंखला ‘गमक’ का ऑनलाइन प्रसारण सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर किया जा रहा है| श्रृंखला अंतर्गत आज जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी की ओर से श्री अरविन्द कुमार पटेल और साथी, सीधी द्वारा ‘बघेली स्वराज गीत’ एवं श्री सोनू काजवे और साथी, हरदा द्वारा ‘गणगौर एवं डण्डा नृत्य’ की प्रस्तुति हुई जिसका प्रसारण विभाग के यूट्यूब चैनल- https://youtu.be/y3yb-4ZSlSY और फेसबुक पेज- https://www.facebook.com/events/811775609392587/?sfnsn=wiwspwa पर लाइव प्रसारित किया गया|  

प्रस्तुति की शुरुआत श्री अरविन्द कुमार पटेल और साथियों द्वारा ‘बघेली स्वराज’ गीत से हुई जिसमें- आवा मिलि दीप जलाई आजु दिन आजादी पाई, एजी भारत माता है जिउ से प्यारी चंदन है एखर शान, पहली सुमिरौ धरती मातु का दूजै गौरी गणेश, जउन हमरे पास है सब कुछु न्योछावर  देश का, सखिया चला चली सीमा पर, देखा पूरब मा आज सुबह एक नई रोशनी फूटी थी, बचाबा दादा हो बचाबा भईया राजा हो एवं काश्मीर खोम्हरी कस टोपा, जे आँख देखामई छूरा घोंपा… का गायन किया|  

मंच पर श्री अरविन्द कुमार पटेल के साथ कोरस में सुश्री माधुरी तिवारी, दीप्ती पटेल, नीलम तिवारी, अनुष्का तबले पर – श्री अमित सोनी, कीबोर्ड पर- मनोज बैरिहा, ढोलक पर- बृहस्पति पटेल एवं घुंगरू पर श्री रूपेश मिश्र ने संगत दी| गीतकार- श्री अरविन्द कुमार पटेल, सीधी       

दूसरी प्रस्तुति श्री सोनू काजवे और साथियों द्वारा निमाड़ अंचल के पारंपरिक लोकनृत्य ‘गणगौर एवं डण्डा नृत्य’ की हुई-  गणगौर निमाड़ का गीति काव्य है, चैत्र और वैशाख माह में नौ-नौ दिन चलने वाला यह अनुष्ठानिक पर्व बेटियों को समर्पित है| सामाजिक जीवन में  महत्ता बताने वाले इस पर्व का लोकाचार आज भी निमाड़ की भूमि और समुदायों के रोजमर्रा की जीवन शैली और व्यव्हार में देखा जासकता है| निमाड़ का कृषक समुदाय फसल कटने के बाद अच्छी पैदावार की ख़ुशी में गण अर्थात शिव और गौर अर्थात पार्वती को अपने यहाँ आमंत्रित करता है और उनकी सेवा करता है| यहाँ पार्वती को बेटी मानते हुए, शिव को दामाद स्वरुप नवें दिन शिव अर्थात धणियर राजा, उन्हें लिवाने आते हैं| इस पर्व की विदाई का क्षण बेटी की ही विदाई की तरह होता है|  

डण्डा नृत्य- सावन माह में रक्षाबंधन के बाद भुजरिया पर्व के अवसर पर निमाड़ अंचल के भुआणा क्षेत्र में किया जाता हैं| नर्तक के दोनों हाथ में सवा-सवा फीट का डंडा होता है। ढोलक, झांझ, मंजीरे की थाप पर डंडो की लय भी पूरे नृत्य गीत को मधुरता प्रदान करती है। श्रीकृष्ण और श्रीराम के भुआणी लोकगीतों का आश्रय लेकर किये जाने वाला यह नृत्य प्रायः कृषक समुदाय का सर्वप्रिय नृत्य है। भुजरिये के अलावा अन्य अवसरों पर भी यह नृत्य देखने को मिलता है।  

प्रस्तुति में श्री सोनू गुजर, विकास, जगदीश खोरे, राजकुमार, रामनिवास, हरिशयाम, रितेश खोरे, तनिश खोरे, शेखर टाले, गौरव बंड, अंकित खोरे, चमन नरघाए, श्री  नरघाए, नितीन पवार, रमेश पटेल, तरूण बाके, जवाला योगी, सुमित खोरे एवं दुर्गेश मालवीय ने सहभागिता की|  

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