सभी राज्यों में शुरू हो बाल पेंशन योजना :डा राघवेंद्र

बच्चे का सर्वोत्तम हित उसके परिवार में निहित है इसलिए बालकल्याण समितियों को चाहिए कि उन सभी संभव संभावनाओं  पर विचार करें जो बालक का जैविक परिवार में सुमेलन सुनिश्चित करें।बाल गृह या अन्य संस्थागत पुनर्वास केवल अंतरिम व्यवस्था है और जेजे एक्ट 2015 अंतिम रूप से परिवार में पुनर्वास की वकालत करता है।बाल कल्याण समितियों को बेहद संवेदनशील तरीके से सरंक्षण एवं सुरक्षा की आवश्यकताओं वाले बच्चों के मामले में निर्णयन की प्रक्रिया अमल में लानी चाहिये।

यह बात आज चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की 46 वी ई संगोष्ठी को संबोधित करते हुए फाउंडेशन के सचिव डॉ कृपाशंकर चौबे ने कही।इस संगोष्ठी में देश भर के 18 राज्यों के सीडब्ल्यूसी एवं जेजेबी बोर्ड के सदस्यों ने भाग लिया।डॉ चौबे ने संगोष्ठी में शामिल सदस्यों को एक्ट के विभिन्न प्रारूपों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।उन्होंने बताया कि सीडब्ल्यूसी के सदस्यों को सबसे पहले जेजे एक्ट का बारीकी से अध्ययन करना चाहिये क्योंकि यह कानून व्यापक रूप से समाज में बच्चों की जन्मजात प्रतिभा औऱ हक के साथ जीने की गारंटी देता है।
डॉ चौबे ने बताया कि  किसी भी सीएनसीपी  श्रेणी का बालक सीडब्ल्यूसी के समक्ष सदैव  प्रारूप 17 में प्रस्तुत किया जाना चाहिये।यह प्रारूप बालक के फिजीकल,मेडिकल,सामाजिक,पारिवारिक एवं उम्र सबंधी समस्त पक्षों को समाहित करता है।इस प्रारूप को बनाते समय विहित पक्षकारों को पूरी ईमानदारी से जानकारी संकलित की जाना जरूरी है।
डॉ चौबे ने सामाजिक अध्ययन रिपोर्ट यानी एसआईआर को जेजे एक्ट के बुनियादी कारकों में एक बताते हुए कहा कि सभी स्टेक होल्डर्स को इस मामले में पूरी समझदारी एवं संवेदनशीलता के साथ काम करना चाहिये क्योंकि यह रिपोर्ट न केवल अपचारी बल्कि सरंक्षण एवं सुरक्षा श्रेणी के बालकों के पुनर्वास में निर्णायक भूमिका अदा करता है।जेजे बोर्ड एवं सीडब्ल्यूसी सभी चिन्हित बालकों के मामलों में यह रिपोर्ट डीसीपीयू,चाइल्डलाइन या एनजीओ से मंगवा सकते है।इस रिपोर्ट में 57 बिंदुओं पर बालकों की सांगोपांग पृष्ठभूमि का विवरण अपेक्षित होता है।
इस रिपोर्ट में संकलनकर्ता अपनी अनुशंसा कर सकते है लेकिन इसे मानने के लिये सीडब्ल्यूसी को अपने विवेक से निर्णय लेना होता है।
श्री चौबे ने प्रारूप 23 के तहत बालकों को सरेंडर करने की प्रक्रिया को भी बारीकी के साथ समझाया।उन्होंने बताया कि अगर कोई अभिभावक अपने बच्चों को सरेंडर करना चाहते है तो सीडब्ल्यूसी की यह जबाबदेही है कि वह ऐसे अभिभावक को उचित व सतत परामर्श के साथ ऐसा नही करने के लिए सहर्ष राजी करें।इस दौरान 60 दिवस में न्यूनतम दो बार परामर्श किया जाना चाहिये क्योंकि बालक का सर्वोच्च हित अंततः मातापिता के साथ ही है।
प्रारूप 25 के तहत लीगल फ्री किये जाने की प्रक्रिया को समझाते हुए डॉ चोबे ने कहा कि जब विभिन्न प्रयासों के बाद भी बालक के जैविक मातापिता से सुमेलन संभव नही हो पाता है तब सीडब्ल्यूसी को न्यूनतम तीन सदस्यीय सहमति के साथ उक्त बालक को गोद के लिए स्वतंत्र किया जाना चाहिए।
कोविड संकट में समितियों की भूमिका की चर्चा करते हुए डॉ चौबे ने बताया कि इस अवधि में बच्चों के लिए फिट फेसेलिटी सेंटर घोषित किये जा सकते है।जहां विहित प्रावधानों की उपलब्धता को देखते हुए सुरक्षा और जरूरतमंद बालकों को रखा जा सकता है।
फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ राघवेंद्र शर्मा ने  मप्र सरकार द्वारा कोरोना में अनाथ हुए बच्चों के लिए 5 हजार पेंशन के प्रावधान की सराहना करते हुए सभी राज्यों के मुख्यमंत्री से आग्रह किया गया कि अपने राज्यों में ऐसी पहल सुनिश्चित की जाए।डॉ राघवेंद्र ने बताया कि वे सीसीएफ़ के माध्यम से इस आशय की चिट्ठी सभी मुख्यमंत्री को लिख रहे है।
कार्यक्रम का संचालन फाउंडेशन के लीगल हैड रूप सिंह किरार ने किया।

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