संस्कृति संचालनालय द्वारा रवीन्द्र भवन के मुक्ताकाश मंच पर 10 से 14 अक्टूबर 2021 तक श्री रामलीला उत्सव का आयोजन किया जा रहा है। पांच दिवसीय रामलीला उत्सव में प्रतिदिन सायं 6.30 बजे से रामकथा के विभिन्न प्रसंगो की प्रस्तुतियां दी जा रही हैं। विगत तीन दिनों में रंगरेज कला संस्कार उज्जैन द्वारा “रामजन्म से श्री राम राज्याभिषेक” तक के प्रसंगों का मंचन किया गया, जिसे दर्शक-श्रोताओं का भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ है।
आगामी दो दिनों में संस्कृति विभाग द्वारा अरण्यक निवासियों और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के समर्पण और सहयोग सम्बन्ध को लोकव्याप्ति प्रदान करने के उद्देश्य वनवासी लीलाएँ तैयार कराई गयीं हैं। उत्सव के चौथे दिन 13 अक्टूबर को गुरू प्रसन्नदास, सतना के निर्देशन में पारसी और समकालीन नृत्याभिनय के माध्यम से वनवासी लीला नाट्य निषादराज गुह्य की प्रस्तुति दी गई तथा 14 अक्टूबर को भक्तिमति शबरी लीला नाट्य को उड़ीसा की पारम्परिक रामलीला मंचन शैली जात्रा को आधुनिक तकनीकि माध्यम से प्रस्तुत किया जाएगा इन दोनों ही प्रस्तुतियों का आलेख श्री योगेश त्रिपाठी द्वारा लिखा गया है। इन लीलाओं की विशिष्टता यह है कि इनके अभिनय से सम्बद्ध कलाकार प्रदेश के अलग-अलग जनजातीय और लोक समुदाय से हैं। उत्सव में विशेष रूप से माननीय सांसद भोपाल साध्वी प्रज्ञा सिंह जी मौजूद रहीं।सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह जी ने चित्र प्रदर्शनी एवं प्रस्तुति का अवलोकन किया। उन्होंने वनवासी लीला नाट्य के निर्देशक गुरु प्रसन्ना दास,आचार्य निर्मलदास एवं आलेख लेखक योगेश त्रिपाठी का पुष्पगुच्छ व शाल श्रीफल से सम्मान किया गया। उत्सव के अवसर पर वनवासी लीला नाट्य आलेख की कथा आधारित 50 चित्रों की प्रदर्शनी भी 10 से 14 अक्टूबर तक प्रदर्शित हैं, जिसमें लीला नाट्य भक्तिमति शबरी को आंध्रप्रदेश की चेरियालपटम् शैली में तथा निषादराज गुह्य को राजस्थान की नाथद्वारा शैली में संयोजित किया गया है। प्रस्तुति का प्रसारण विभाग के यूट्यूब चैनल https://youtu.be/hS_c0QN97BE और फेसबुक पेज https://www.facebook.com/events/973571246524242/?sfnsn=wiwspwa पर लाइव प्रसारित किया गया।
आज के लीला नाट्य में भगवान राम ने वन यात्रा में निषादराज से भेंट की। भगवान राम से निषाद अपने राज्य जाने के लिए कहते हैं लेकिन भगवान राम वनवास में 14 वर्ष बिताने की बात कहकर राज्य जाने से मना कर देते हैं। आगे के दृश्य गंगा तट पर भगवान राम केवट से गंगा पार पहुंचाने का आग्रह करते हैं लेकिन केवट बिना पांव पखारे उन्हें नाव पर बैठाने से इंकार कर देता है। केवट की प्रेम वाणी सुन, आज्ञा पाकर गंगाजल से केवट पांव पखारते हैं। नदी पार उतारने पर केवट राम से उतराई लेने से इंकार कर देते हैं। कहते हैं कि हे प्रभु हम एक जात के हैं मैं गंगा पार कराता हूं और आप भवसागर से पार कराते हैं इसलिए उतरवाई नहीं लूंगा। लीला के अगले दृश्यों में भगवान राम चित्रकूट होते हुए पंचवटी पहुंचते हैं। सूत्रधार के माध्यम से कथा आगे बढ़ती है। रावण वध के बाद श्री राम अयोध्या लौटते हैं और उनका राज्याभिषेक होता है। 1 घंटे 45 मिनट अवधि की इस प्रस्तुति में जनजातीय और लोक समुदाय के 24 कलाकारों द्वारा उत्कृष्ट अभिनय करते हुए, प्रस्तुति को जीवन्तता प्रदान की। पूरी लीला में श्री राम और वनवासियों के परस्पर सम्बन्ध को उजागर किया गया। लीला नाट्य के अभिनय पक्ष में प्रमुख रूप से निषादराज अजय सिंह श्याम, केवट सतीश व्याम, राम योगेंद्र चंद्रवंशी ,सीता ममता धुर्वे, लक्ष्मण विनोद तेकाम, दशरथ नवीन श्याम, गंगा पारूल सिंह एवं अन्य रहे।
Leave a Reply