विविध कलानुशासनों की गतिविधियों का ऑनलाइन प्रदर्शन

मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग की विभिन्न अकादमियों द्वारा कोविड-19 महामारी के दृष्टिगत बहुविध कलानुशासनों की गतिविधियों पर एकाग्र श्रृंखला ‘गमक’ का ऑनलाइन प्रसारण सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर किया जा रहा है| श्रृंखला अंतर्गत आज जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी की ओर से श्री रूपसिंह कुशराम और साथी, डिंडौरी द्वारा ‘गोंडी स्वराज गीत’ एवं सुश्री रितु शर्मा और साथी, उज्जैन द्वारा ‘मटकी नृत्य’ की प्रस्तुति हुई जिसका प्रसारण विभाग के यूट्यूब चैनल- https://youtu.be/cR2azuBFUpg और फेसबुक पेज- https://www.facebook.com/events/592960511703308/?sfnsn=wiwspwa पर लाइव प्रसारित किया गया|  

प्रस्तुति की शुरुआत श्री रूपसिंह कुशराम और साथियों द्वारा गोंडी ‘स्वराज गीत’ गीतों से हुई | गायन में- रीना गीत- भारत माता के पाँव पखारों, करमा- ‘ठाड़ी’- भारत लड़नी को जाय, सैला- ‘लहकी’- तरना ना रीना, ऊँचो दाऊ रे, ददरिया- धीरे गायले, गांधी महात्मा भारत सरकार गा लड़ाई मा, दादरा- चोय मान्दीवेन, नेहरु, गांधी जी चोय मान्दीवेन, करमा- झूमर- दुर्गा रानी जादू मारे, दादरा- देश ला काम आबो, तुम सब की भई रे पुकार, करमा- हम भारत के गोंड बैगा, दादरा- पालाड़ी पाल, फाग-झूला- मामा ना रचाड़ा रोवाले सांगो, दादरा- चरखा चलीने थमा थम के, करमा- तिरंगा झंडा यार लहर-लहर लहराये एवं देश भक्ति गीत भारत की जय बोलो का गायन किया|  

प्रस्तुति में गायन में श्री चैनसिंह श्याम, दिनेश, सुश्री दीपा एवं सुश्री संध्या ने, वादन में मादर पर- श्री चंद्रपाल, टिमकी पर-श्री विवेक, ढोलक पर- श्री रजनसिंह एवं मजीरा पर- श्री देवेन्द्र ने संगत दी| 

दूसरी प्रस्तुति सुश्री रितु शर्मा और साथियों द्वारा ‘मटकी नृत्य’ की हुई| प्रस्तुति की शुरुआत गणेश स्तुति- विनायक ‘सेवा म्हारी मानी लो गणेश देवता’ से हुई उसके पश्चात पारंपरिक मटकी लोकनृत्य में- आड़ा, खड़ा, राजवाड़ी, कहरवा, मटकी एवं फूंदी पर नृत्य प्रस्तुत किया एवं पनिहारी नृत्य से अपनी प्रस्तुति को विराम दिया| 

मटकी मालवा का पारम्परिक नृत्य है,जो कि विभिन्न त्योहारों तथा खुशियों के मोकों पर किया जाता है, मटकी का वास्तविक अर्थ मटकने से लिया जाता है ।मटकी नृत्य की परम्परा मालवा के जनपदीय क्षेत्रों में शताब्दियों से रही है, इस नृत्य को आड़ा, खड़ा तथा रजवाड़ी ओर मटकी जैसे विभिन्न चरणों में किया जाता है| यह नृत्य महिलाओं द्वारा किया जाने वाला एक ऐसा सुन्दर रूपक है, जिसमे मालवा की मनोहारी संस्कृति की झलक मिलती है| बड़े ढोल की एक खास लय पर नृत्यांगनायें विभिन्न देह मुद्राओं के माध्यम से नृत्य करती हुई पुरे माहोल को एक उत्सवी आनंद में बदल देती हैं| सुश्री रितु शर्मा जी के निर्देशन में की गई इन प्रस्तुतियो में शाश्वत शुक्ला, याशिका पाण्डे, नंदनी वधावन, अवनी जोशी, देवयानी व्यास, हिमांशी कसेरा, कृतिका शर्मा, जितांशी जैन, सृष्टि शर्मा, हर्षिता मुछाल, मिष्ठी भूतड़ा एवं हर्षिता देवधरे ने नृत्य में सहभागिता की और गायन- सुश्री रितु शर्मा (स्वयं) ढोलक पर- श्री आशुतोष सक्सेना, हारमोनियम पर- रोहित, ढोल/खंजरी पर- श्री दीपक ने संगत दी| 

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