लोक एवं शास्त्रीय नृत्य का सांस्कृतिक अंतर-संबंध विषय पर वेबीनार

शास्त्रीयता तक पहुँचने का रास्ता लोक से ही शुरू होता है। संगीत, नृत्य या नाट्य जैसी किसी भी
प्रदर्शनकारी कला की बात करें तो हम पाते हैं कि सबका मूलभूत आधार लोक परम्परा ही है। प्रदर्शनकारी कला के प्राचीन संस्कृत शास्त्र के रचयिता आचार्य भारतमुनि अपनी कालजयी कृति ‘नाट्यशास्त्र’ से भी इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि इस शास्त्र के बनाने का आधार लोक की गतिविधियाँ और परम्पराएँ हाई हैं।

लोक और शास्त्रीयता के इस अंतरसंबंध को समझते हुए और इस विषय को अधिक स्पष्टता से समझने की जिज्ञासा को केंद्र में रखते हुए रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के मनविकी एवं उदार कला संकाय के तीन केंद्रों द्वारा एक दिवसीय वेबिनार का आयोजन किया गया। टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केंद्र, टैगोर लोक भाषा एवं संस्कृति केंद्र, तथा कला एवं प्रदर्शनकारी कला केंद्र के इस प्रतिष्ठित आयोजन का विषय था “लोक एवं शास्त्रीय नृत्य का सांस्कृतिक अंतर-संबंध”। इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में नालंदा नृत्य कला महाविद्यालय की प्राध्यापक डॉ. उमा रेले उपस्थित थी। इस कार्यक्रम को परिचर्चा के रूप में प्रस्तुत करते हुए डॉ. रेले के साथ बातचीत के सिलसिले में टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केंद्र के निदेशक और जाने-माने कला समीक्षक श्री विनय उपाध्याय शामिल रहे।
इस परिचर्चा के अंर्तगत डॉ. रेले और श्री उपाध्याय ने लोक नृत्यों की जीवन में भूमिका, शास्त्रीय नृत्यों का लोक से उदय, लोक और शास्त्रीय नृत्यों की समानताओं और विशिष्टताओं जैसे अनेक बिंदुओं को
छुआ। इस परिचर्चा के दौरान अनेक ऐसे महत्वपूर्ण संदर्भ भी उठे जिनसे भरतनाट्यम, मोहिनीअट्टम, ओडीसी जैसी प्रख्यात भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों की लोक से शास्त्रीयता की यात्रा की चर्चा ने ऑन- लाइन माध्यम से जुड़े प्रतिभागियों को आकर्षित किया। डॉ. रेले ने बहुत ही सजता से आदिवासी, लोक एवं शास्त्रीय नृत्यों और समाज में होते परिवर्तन के साथ इस नृत्यों पर प्रभाव के बारे में चर्चा की। उन्होंने बताया कि किस तरह समय के साथ शास्त्रीय नृत्यों को समाज में एक प्रतिष्ठित कला के रूप में देखा जाने लगा लेकिन वहीं लोक नृत्यों को प्रतिष्ठा की उस श्रेणी में कमतर माना गया। जबकि विश्व में प्रसिद्ध ओडीसी जैसी नृत्य शैली गोटिपुआ लोक नृत्य के बहुत क़रीब है और जिसका अपना एक इतिहास है। श्री उपाध्याय ने मणिपुरी आदि देश की विभिन्न नृत्य शैलियों के विषय में दिलचस्प सवाल डॉ. रेले के सामने रखे। डॉ. रेले ने सभी सवालों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए डॉ. रेले ने श्री उपाध्याय के साथ अपनी चर्चा में साझा किया कि भारत भी नहीं बल्कि एक कला के रूप में नृत्य सिर्फ़ कला नहीं है बल्कि अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण और सुंदर माध्यम है। उन्होंने बताया कि भारतीय कला का ध्यय ही मानव को अभिव्यक्ति के माध्यम से सकारात्मकता की ओर ले जाना है। साथ ही हर कला अपने आप में विभिन्न स्तरों पर संचार का भी महत्वपूर्ण कार्य करती है, ऐसा उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से बताया। इसका बड़ा कारण यह भी है की न्तरिय हमारी संस्कृति के साथ इतना घुला-मिला है कि वह हमारी भाषा में भी शामिल है। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि हमारे यहाँ पेड़ों का हिलने को नाचना कहा जाता है, वहीं फूलों के हिलने को झूमना कहकर सम्बोधित किया जाता है। इस
महत्वपूर्ण चर्चा के दौरान अनेक ऐसे बिंदु सामने आए जिनसे भारतीय नृत्य के संस्कृति महत्व को स्पष्टा से देखा जा सकता है।

इस एक दिवसीय वेबिनार का संयोजन एवं संचालन पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग की सहायक
प्राध्यापक सुश्री विशाखा राजुरकर राज द्वारा किया गया जिसका आयोजन मनविकी एवं उदार कला संकाय की अधिष्ठाता डॉ. संगीता जौहरी के सानिध्य में किया गया। कार्यक्रम के अंत में भाषा विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ.रुचि मिश्रा तिवारी ने इस परिचर्चा में सक्रीय भागीदारी के लिए मुख्य वक्ताओं का तथा उपस्थित सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

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