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लोकोत्सव में भगोरिया नृत्य की प्रस्तुति
मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में दो दिवसीय लोकोत्सव का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें पहले दिन 21 अगस्त को अजय सिसोदिया एवं साथी द्वारा भील भगोरिया नृत्य की प्रस्तुति दी गई। फागुन के मौसम में होली से पूर्व भगोरिया हाटों का आयोजन होता है। भगोरिया हाट केवल हाट न होकर युवक-युवतियों के मिलन मेले हैं।
भगोरिया हाट में भील युवक-युवतियाँ रंग-बिरंगे परिधानों में सजे- धजे गाते-बजाते, झूमते-नाचते सामूहिक नृत्य गेहर के साथ हाट में शामिल होते हैं। यहीं से युवक-युवतियाँ एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं, आकर्षित होते हैं और जीवन सूत्र में बंधने के लिये भाग जाते हैं इसलिये इन हाटों का नाम भगोरिया पड़ा। भगोरिया नृत्य में विविध पदचाप समूहन पाली, चक्रीपाली तथा पिरामिड नृत्य मुद्राएं आकर्षण की केन्द्र होती हैं। रंग-बिरंगी वेशभूषा में सजी-धजी युवतियों का श्रृंगार और हाथ में तीरकमान लिये नाचना ठेठ पारम्परिक व अलौकिक सरंचना है। अगली प्रस्तुति ललता राम मरावी द्वारा गोंड गुदुमबाजा की प्रस्तुति दी गई। गुदुमबाजा नृत्य गोण्ड जनजाति की उपजाति का पारम्परिक नृत्य है। इस जनजाति में गुदुम वाद्य वादन की भी सुदीर्घ परम्परा है। गुदुम, डफ, मंजीरा, टिमकी आदि वाद्यों के साथ शहनाई की धुनों पर वादन एवं नर्तन किया जाता है। विशेषकर विवाह एवं अन्य अनुष्ठानिक अवसरों पर इस जाति के कलाकारों को मांगलिक वादन के लिए अनिवार्य रूप से आमंत्रित किया जाता है। तीसरी प्रस्तुति मंशाराम अखंडे द्वारा कोरकू जनजातीय नृत्य थापटी की प्रस्तुति दी गई। नृत्य में टीमकी, चितकोरा, झांझ का प्रयोग कर लेकर नृत्य किया। नृत्य दौरान पुरुष धोती कुर्ता एवं महिलाएं साड़ी पहनकर नृत्य करती हैं।




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