‘लोकरंग’ में हुईं रंगारंग प्रस्तुतियाँ

भोपाल में आयोजित ‘लोकरंग’ उत्सव में आज उल्लास के अंतर्गत रवींद्र भवन सभागार में बच्चों की फिल्मों – गट्टू (हिन्दी) 2011-निर्देशक -राजन खोसा एवं गऊरू-जर्नी ऑफ करेज 2016- निर्देशक -राम किशन चोयल का प्रदर्शन किया गया| 

सायं 05 बजे से पूर्वरंग के अंतर्गत लोकराग में श्री रहमुद्दीन एवं साथियों द्वारा भोजपुरी गायन से प्रस्तुति हुई जिसकी शुरुआत उन्होने शिव भजन ‘जटवा से गंगा वहे’, बिरह – ‘अंगना में पड़ेला थुहरवा’, चैती- लिये न कोनऊ खबरिया’, छपरैया पूर्वी- ‘मत जा विदेशवा के हो’ आदि भोजपुरी गीत प्रस्तुत कर दर्शक-श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया|          

        दूसरी प्रस्तुति खण्डवा से पधारी सुश्री हेमलता उपाध्याय एवं साथियों द्वारा निमाड़ी गायन की हुई जिसमे उन्होने गणेश वंदना- ‘गणपति आयो’, माँ नर्मदा स्तुति- ‘सच्चा मन से भजन करूंगा, माई नर्मदा मैं तेरी सेवा करूंगा’, जन्म गीत- ‘जन्म भया रे राम बड़ा आनंद मा’, खेल गीत- ‘चल्वो संजा अपण खेलवा जावां’, ‘छोटी सी गाड़ी मुड़क जाये’, ‘संजा तू थारे घर जा’, ‘ऊपर बैठी चिड़िया’, बिदाई गीत- ‘हँऊ तो नई जांऊ दादा जी सासरियो’, गणगौर गीत – ‘कि शुक्र को तारो चमक रयो’ आदि निमाड़ी गीत प्रस्तुत किये|                                                                                  

उसके बाद कश्मीर से पधारे श्री पंकज हांडु एवं साथियों ने कश्मीरी लोकगायन प्रस्तुत किया- जिसमे उन्होंने- कश्मीर की लोकप्रिय शैली चकरी-फकरी में विविध कश्मीरी परंपरागत शैलियों के गीतों को प्रस्तुत कर श्रोताओं को आनंदित किया|                                         

एवं श्री शौकीन खान एवं साथी, राजस्थान ने माण्ड गायन प्रस्तुत किया जिसमे उन्होने राजस्थान का प्रसिद्द गीत- ‘केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश’ एवं वाद्य यन्त्र भवंग की जुगल बंदी से दर्शकों का मन मोह लिया|  

सायं 07 बजे से धरोहर के अंतर्गत सुश्री अग्नेश केरकेट्टा और साथियों द्वारा छत्तीसगढ़ ‘हम’ उराँव की समवेत प्रस्तुति दी गई – प्रकृति की गोद में पलने वाले उराँव जीव-जन्तु, पेड़-पौधों को अपना पूर्वज मानते हैं, अपनी संस्कृति से इसी रूप को नृत्य-नाट्य के माध्यम से प्रस्तुत किया |  

श्री दीपक अग्रवाल और साथी उत्तरप्रदेश द्वारा मयूर नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी गई- मयूर नृत्य की प्रस्तुति में जब राधा मोर के नृत्य को देखने की लालसा करती है और उन्हें कहीं भी मोर नहीं दिखता तो वह कृष्ण से आग्रह करती हैं, कृष्ण मोर के रूप में नृत्य करते हैं| इस प्रस्तुति में नर्तक मोर के पंख से बने विशेष वस्त्र धारण कर नृत्य गायन करते हैं।  

श्री एच. तीर्थप्पा एवं साथी, कर्नाटक द्वारा ढोलूकुनीता नृत्य की प्रस्तुति हुई, ढोलूकुनिता नृत्य- कर्नाटक का एक प्रमुख लोकप्रिय नृत्य है। गायन के साथ, यह कौशल की शानदार विविधता और जटिलता प्रदान करता है। ढोल का नृत्य के साथ समवेत वादन और नर्तन इस नृत्य को अनूठा बनाता है। 

सुश्री अनुसुइया एवं साथी, छिंदवाड़ा द्वारा सैताम नृत्य की प्रस्तुति हुई, सैताम- नृत्य भारिया महिलाओं द्वारा किया जाने वाला नृत्य है, एक पुरुष घेरे के बीच ढोलक बजाता है| सैताम नृत्य में किशोरियों की अधिक हिस्सेदारी होती है, विवाह के अवसर पर युवतियाँ हाथ में मंजीरा या चिट्कुला लेकर रात भर नृत्य करते नहीं थकती| हाथ, पैर और कमर के साथ चलने और झुकने से तालाब की लहर की तरह सैताम नृत्य चलता दिखाई देता है|   

श्री अनिल कोलेकर और साथी, महाराष्ट्र द्वारा धनगिरीगजा नृत्य की प्रस्तुति हुई, धनगरी गजा नृत्य महाराष्ट्र के प्रसिद्ध लोक नृत्यों में से एक है। यह नृत्य शोलापुर ज़िले की गडरिया जाति के लोगों द्वारा किया जाता है, जिन्हें ‘धनगर’ कहते हैं। घुमन्तु जीवन जीने वाले ये लोग अपने इष्ट देवता ‘बिरूआ’ के जन्म की गाथा गाते हुए नृत्य करते हैं| 

श्री शौकीन खान और साथी, उत्तरप्रदेश द्वारा कालवेलीय नृत्य की प्रस्तुति हुई- कालबेलिया नृत्य राजस्थान के प्रसिद्ध लोक नृत्यों में से एक है। यह नृत्य कालबेलिया, जो कि एक सपेरा जाति है, के द्वारा किया जाता है। कालबेलिया नृत्य में सिर्फ़ स्त्रियाँ ही भाग लेती हैं। राजस्थान की प्रसिद्ध लोक नर्तकी गुलाबो नें इस नृत्य को देश-विदेश में बहुत नाम दिलाया है। इस नृत्य में पुरुष सिर्फ़ ‘इकतारा’ या ‘तंदूरा’ लेकर महिला नर्तकी का साथ देते हैं। 

श्री प्रकाश विष्ट और साथी, उत्तराखण्ड द्वारा जोनसारी नृत्य की प्रस्तुति हुई- जोनसारी नृत्य उत्तराखण्ड के जोनसार क्षेत्र का प्रसिद्ध नृत्य है, नृत्य-गान के माध्यम से मंदिरों में सभी की सुख-समृद्धि के लिए दुआएँ मांगी जाती हैं, प्रस्तुति में ‘ले बूजी जालारे चूड़ा’ गीत के माध्यम से दी गई इस प्रस्तुति ने दर्शकों का मन मोह लिया| 

श्री मंशाराम और साथी हरदा द्वारा कोरकू जनजाति के गदली/थापटी नृत्य की प्रस्तुति हुई- गदली/थापटी नृत्य- की वेशभूषा अत्यधिक सादगीयुक्त और सुरूचिपूर्ण होती है। पुरूष सफेद रंग पसंद करते हैं, सिर पगड़ी और कलंगी पुरूष नर्तक खास तौर से लगाते हैं। स्त्रियाँ लाल, हरी, नीली, पीली रंग की किनारी वाली साड़ी पहनती है। स्त्री के एक हाथ में चिटकोला होता है, जिसे वे लय और ताल के साथ नृत्य करती हुई बजाती हैं। पुरूषों के हाथ में बांसुरी होती है, जिसकी लय के साथ चिटकोला बजाते हुए महिलाएँ नृत्य करती हैं। कोरकू नृत्यों में ढोलक की प्रमुख भूमिका होती है। ढोलक की लय और ताल पर कोरकू हाथों और पैरों की विभिन्न मुद्राओं को बनाते हुए गोल घेरे और विभिन्न मुद्राओं में नृत्य करते हैं। 

श्री दायाराम जांगड़े और साथी, छतीसगढ़ द्वारा पंथी नृत्य की प्रस्तुति हुई, पंथी नृत्य- छत्तीसगढ के सतनामी समुदाय का प्रमुख नृत्य है- इस नृत्य में एक मुख्य नर्तक होता है जो पहले गीत की कड़ी उठता है जिसे समूह के अन्य नर्तक दोहराते है एवं नाचते है। यह नृत्य धीमी गती के साथ शुरू होती है, और गीत एवं मृदंग की लय के साथ गती बढ़ती है। यह वस्तुतः द्रुत गती का नृत्य है। 

प्रदेश एवं देश के अन्य राज्यों से पधारे कलाकारों की इन प्रस्तुतियों ने दर्शकों को

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