रूपन सामंता द्वारा ‘भोजपुरी लोक एवं ठुमरी गायन’ की प्रस्तुति

एकाग्र ‘गमक: रंग मध्यप्रदेश’ श्रृंखला अंतर्गत भोजपुरी साहित्य अकादमी द्वारा सुश्री रूपन सामंता, हरिद्वार द्वारा ‘भोजपुरी लोक एवं ठुमरी गायन’ की प्रस्तुति दी गई | गायन की शुरुआत मिश्र खमाज की ठुमरी- कारे मतवारे मन हर लीनों श्याम से हुई|

पश्चात्- मिश्र पहाड़ी में चैती- चैत मास बोलेले कोयलिया, मिश्र पिलू में होली- आँखिन भरत गुलाल रसिया न माने, कजरी- झिर-झिर बरसे सावन रस बुंदिया और भैरवी भजन- जोगिया तू कब रे मिलोगे आई से अपनी गायिकी को विराम दिया | गायन में तबले पर श्री रामेन्द्र सोलंकी एवं हारमोनियम पर श्री जमीर खान ने संगत की |        

रूपन सामंता बनारस घराने की अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गायिका पदम्विभूषण स्व. सुश्री गिरिजा देवी की शिष्या है। उन्होंने सुश्री गिरिजा देवी के सानिध्य में 10 वर्ष तक गुरूगृह में रहकर संगीत की शिक्षा प्राप्त की है। सुश्री सामंता ने बनारस घराने की विधाओं-खयाल, टप्पा, ठुमरी,दादरा, झुला, कजरी, होली, चैती इत्यादि अनुषंगों में शिक्षा प्राप्त की है। आप आकाशवाणी एवं भारतीय सांस्कृतिक सम्बद्ध परिषद से जुड़ी हैं। आपने देश एवं विदेश में कई प्रस्तुतियाँ दी हैं । आपको समय-समय पर कई पुरस्कार यथा – सुरमनी, कला केतकी एवं कला रत्न इत्यादि प्राप्त हुए हैं।      

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