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यूपी में पिता-पुत्र में दरार के बाद अब सभी दलों की निगाहें टिकी
समाजवादी पार्टी में तेजी से बदल रहे समीकरणों के कारण उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज भूचाल आ गया है जिससे तमाम राजनीतिक दलों की निगाहें सपा के घटनाक्रम पर टिक गई हैं। अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव के पार्टी से निष्कासन के बाद जहां यूपी सरकार संकट में पकड़ने के आसार लग रहे हैं तो इसे देखते हुए अखिलेश यादव ने शनिवार को अपने विधायकों से मुलाकात का प्रोग्राम बनाया है। वहीं रामगोपाल ने पार्टी के राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन की घोषणा कर दी है।
यूपी में दो दिन से चल रहे समाजवादी पार्टी के घटनाक्रम में पहले समाजवादी पार्टी के मुखिया राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने घोषित प्रत्याशियों की सूची जारी की जिसमें अखिलेश यादव के समर्थकों के टिकट काट दिए गए। इस सूची जारी होने के बाद अखिलेश यादव ने मुलायम व शिवपाल सिंह यादव के करीबी दो नेताओं की नियुक्तियों को समाप्त कर दिया। साथ ही अपने समर्थक नेताओं की 235 प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी।
इस घमासान के बीच शुक्रवार को सपा सुप्रीमो और अखिलेश यादव के पिता मुलायम ने शिवपाल सिंह यादव के साथ मिलकर बातचीत की। इसके बाद अखिलेश और रामगोपाल को नोटिस जारी कर दिए। कुछ समय बाद दोनों को पार्टी से छह-छह साल के लिए निष्कासित भी कर दिया। इस निष्कासन से यूपी में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के समर्थकों में भारी रोष व्याप्त हुआ और मुलायम सिंह यादव व शिवपाल सिंह यादव के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा। ये लोग दोनोंके बंगलों पर जा पहुंचे और नारेबाजी करने लगे।
अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव ने मिलकर मुलायम व शिवपाल सिंह यादव की रणनीति का जवाब देने के लिए प्रोग्राम तय किया। रामगोपाल ने जहां समाजवादी पार्टी में सरकार के बाहर के नेताओं की संख्या अखिलेश के पक्ष में कितनी है, इसका पता लगाने के लए एक जनवरी को राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मलेन आहूत कर लिया है। इससे समाजवादी पार्टी में टूट पड़ेगी और मुलायम व अखिलेश अपने-अपने धड़ों के प्रमख हो जाएंगे।
वहीं अखिलेश ने अपने समर्थन में विधायकों का पता लगाने के लिए शनिवार को एमएलए से व्यक्तिगत मुलाकात का समय तय कर दिया। इस मुलाकात पर न केवल मुलायम-शिवपाल सिंह की नजरें टिकी हैं बल्कि दूसरे विपक्षी राजनीतिक दल भी टकटकी लगाए बैठे हैं। शनिवार को अखिलेश अपने पक्ष में एक अच्छी संख्या में विधायकों को कर पाए तो ठीक है लेकिन थोड़ा भी इधर-उधर हुआ तो राज्यपाल केंद्र सरकार को कोई कड़ी सिफारिश कर सकते हैं। इससे समाजवादी पार्टी को चुनाव के पहले बड़ा झटका लग सकता है और फिर यूपी के चुनाव में सभी राजनीतिक दलों को जमीन पर उतरकर लड़ाई लड़ना होगी।




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