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मृग मरीचिकाः CM चेहरा-कार्यकारी अध्यक्ष पर बयानों के बीच सिंधिया के गढ़ में कांग्रेसी एकता
कांग्रेस की गुटबाजी को नेता दशकों से आतंरिक लोकतंत्र कहकर उसे पार्टी के लिए हेल्दी बताते रहे हैं मगर इस बार बड़े नेताओं के बीच मतभेद सरकार के गिरने से व्यवहार में झलकने लगे हैं। कुछ महीने बाद होने वाले चुनावों में कार्यकर्ताओं के बीच नेता आपसी एकता को दिखाने के लिए एकसाथ कार्यक्रम में पहुंचकर इस पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं। पिछले कुछ समय से बड़े नेताओं के बीच दूरी संगठन के फैसलों में दिखाई देने से एकता मृगमरीचिका बन गई है। कांग्रेसी नेताओं की एकता पर हमारी खास रिपोर्ट।
मध्य प्रदेश में 2018 में किसी तरह कांग्रेस की सरकार बन गई थी क्योंकि भाजपा और कांग्रेस को मिले मतों में 0.13 फीसदी वोटों का ही अंतर था। मगर इस बार भाजपा-कांग्रेस के बीच सरकार बनाने में मतों का यह अंतर इससे कई गुना ज्यादा होगा क्योंकि इन दलों के अलावा अब मतदाता भी आर-पार का फैसला देने के मूड में चुप्पी साधे है। कांग्रेस इस मूड को भांपते हुए अपने बड़े नेताओं के बीच की दूरियों को लेकर चिंतित दिखाई दे रही है। नए साल 2023 के पहले दिन से यह दूरियां उस समय अचानक बढ़ती दिखाई दीं जब अचानक सीएम चेहरा कमलनाथ के पोस्टर-होर्डिंग प्रदेश में लगा दिए गए। इसी बीच कार्यकारिणी का गठन हो गया जिसमें कुछ नेताओं की नाराजगी सामने आई।

जेपी, पटवारी, यादव के बयानों से नाराजगी झलकी
सीएम चेहरा कमलनाथ के पोस्टर-होर्डिंग सामने आने के बाद एक पत्रकार ने जब कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी जयप्रकाश अग्रवाल से सवाल कर लिया तो उन्होंने पार्टी के सिस्टम का बता दिया। सिस्टम में सीएम का चयन चुनाव के बाद पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी व निर्वाचित विधायकों द्वारा किए जाने की बात कही। कमोबेश यही बात हाल ही में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव ने भी दोहरा दी। जब कार्यकारिणी की घोषणा हुई तो पूर्व मंत्री जीतू पटवारी ने अपने आपको कार्यकारी अध्यक्ष होने की बात कही और इसके पीछे उन्होंने उनकी नियुक्ति राहुल गांधी द्वारा किए जाने का कारण भी बताया।

अब नेताओं ने एकसाथ सिंधिया के गढ़ में पहुंचकर एकता दिखाई
उपरोक्त परिस्थितियों के बाद नेताओं कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, अरुण यादव ने अब एकता दिखाने के लिए भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के गढ़ में एकसाथ पहुंचे। इसके पूर्व टीकमगढ़ में भी कमलनाथ-अरुण यादव को साथ लेकर गए थे। इससे कार्यकर्ताओं को यह संदेश देने की कोशिश की गई कि वे लोग साथ हैं लेकिन हमेशा की तरह यह मृगमरीचिका जैसा लगता है। कार्यक्रमों में दिखाई देने वाली कांग्रेस नेताओं की यह एकता विधानसभा चुनाव के लिए होने वाले फैसलों में दिखाई देती है या नहीं यह समय बताएगा।
नेताओं के बीच मतभेदों के यह रहे हैं कारण
इस सरकार को बड़े नेताओं के बीच मतभेदों के चलते कमलनाथ मुख्यमंत्री होते हुए भी विधायक दल के नेता की तरह फैसले नहीं ले सके। मंत्रिमंडल के गठन से ही बड़े नेताओं की दखलदांजी बढ़ी। सीनियर-जूनियर विधायकों को मंत्रिमंडल में एक जैसा कैबिनेट मंत्री बना दिया गया। फिर मंत्रियों के बीच विभाग वितरण में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी, अरुण यादव खेमों में खींचतान चली।

सीएस चयन से लेकर नियुक्तियों में दखलदांजी
सरकार जब काम करने लगी तो प्रशासनिक फैसलों में भी सीएम कमलनाथ के अलावा बड़े नेताओं की दखलदांजी शुरू हुई। मुख्य सचिव की नियुक्ति में भी सीएम कमलनाथ को बड़े नेताओं की सुनना पड़ी। इसी तरह कुछ गैर राजनीतिक नियुक्तियां की गईं जिसमें कांग्रेस के दूसरे बड़े नेताओं ने दखल दिया। कुछ विभागों में प्रदेश कांग्रेस कमेटी कार्यालय में बैठे लोगों ने अधिकारियों को गाइड करने के साथ अपने विचारों के मुताबिक फैसले कराना शुरू कर दिए।




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