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मालवी लोकगायन एवं गोंड जनजातीय नृत्य की प्रस्तुति
एकाग्र ‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत आज आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा सुश्री तृप्ति नागर एवं साथी, उज्जैन ने मालवी लोकगायन की एवं श्री सुकल सिंह धुर्वे एवं साथी, डिंडोरी ने गोंड जनजातीय नृत्य की प्रस्तुति दी|
प्रस्तुति की शुरुआत सुश्री तृप्ति नागर एवं साथियों द्वारा मालवी लोकगायन से हुई जिसमें सर्वप्रथम गणेश वंदना- “थाँसू बिनतो बारम्बार गणनायक आज पधारो” पश्चात- “म्हारो तो घर में वो जरणी ससरा नई बोले”, “घेरा रो घमीड़ो मैं तो पाणी भरता”, “एक बार आवोजी जमाई जी पामणा”, “सड़क पर आफू की क्यारी” एवं “आल्की की पालकी जय कन्हैयालाल की” आदि मालवी गीत प्रस्तुत किये|
सुश्री तृप्ति नागर विगत पच्चीस वर्षों से सांगीतिक प्रस्तुतियां देती आ रही हैं, आप आकाशवाणी, इंदौर एवं देश के विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुति दे चुकी हैं|
मंच पर- सहगायक के रूप में सुश्री राधा महता, करुना सिसोदिया, तारा एवं सुश्री प्रियाशी नागर, चतरी पर- श्री त्रिमेश नागर और श्री वंश सिसोदिया, ढोलक पर- श्री विवेक ढाल, तबले पर- श्री प्रियाश नागर एवं हारमोनियम पर श्री आकाश मल्होत्रा ने संगत दी|
दूसरी प्रस्तुति श्री सुकल सिंह धुर्वे एवं साथियों द्वारा गोंड जनजातीय नृत्य ‘करमा एवं सैला’ की हुई|
करमा नृत्य –
‘कर्म’ की प्रेरणा देने वाला नृत्य है, पूर्वी मध्यप्रदेश में कर्मपूजा का उत्सव मनाया जाता है, उसमें करमा नृत्य किया जाता है| नृत्य में युवक-युवतियाँ दोनों भाग लेते हैं। वर्षा को छोड़कर प्रायः सभी ऋतुओं में गोंड आदिवासी करमा नृत्य करते हैं। मध्यप्रदेश में करमा नृत्य-गीत का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। सुदूर छत्तीसगढ़ से लगाकर मंडला के गोंड और बैगा आदिवासियों तक इसका विस्तार मिलता है।
सैला नृत्य शरद ऋतु की चाँदनी रातों में किया जाता है। हाथों में लगभग सवा हाथ के डंडे के कारण इसका नाम सैला पड़ा। आदिदेव को प्रसन्न करने के लिए सैला नृत्य का प्रचलन है। करमा सैला गोंड जनजाति का लोकप्रिय नृत्य है।
मंच पर- श्री सुकल सिंह धुर्वे के साथ श्री महेंद्र सिंह, धुर सिंह, पंचम सिंह, लक्ष्मण सिंह, धरम सिंह, शिव चरण, अम्मेलाल, रतिराम, राखी मरावी, रागनी मरावी, छोटी धुर्वे, चमेली बाई, दीपका धुर्वे एवं गंगा वती ने नृत्य किया|




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