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माता सती अनुसुईया के सती चरित्र का वर्णन
संस्कार उत्सव समिति के संयोजक डॉ. सुरजीत सिंह चौहान द्वारा आयोजित श्रीरामकथा के द्वितीय दिन परम पूज्य संत साध्वी विश्वेश्वरी देवी जी (हरिद्वार) ने माता सती अनुसुईया के सती चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि सती अनुसूईया महर्षि अत्री की पत्नी थी। जो अपने पतिव्रता धर्म के कारण सुविख्यात थी। एक दिन देव ऋषि नारद जी बारी-बारी से विष्णुजी, शिव जी और ब्रह्मा जी की अनुपस्थिति में विष्णु लोक, शिवलोक तथा ब्रह्मलोक पहुंचे। वहां जाकर उन्होंने लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सावित्री जी के सामने अनुसुइया के पतिव्रत धर्म की बढ़ चढ़ के प्रशंसा की तथा कहाँ की समस्त सृष्टि में उससे बढ़ कर कोई पतिव्रता नहीं है। उन्होंने निश्चय किया की हम अपने पतियों को वहां भेज कर अनुसूईया का पतिव्रत धर्म खंडित कराएंगे। ब्रह्मा, विष्णु और शिव जब अपने अपने स्थान पर पहुँचे तो तीनों देवियों ने उनसे अनुसूईया का पतिव्रत धर्म खंडित कराने की जिद्द की। तीनों देवों ने बहुत समझाया कि यह पाप हमसे मत करवाओ। परंतु तीनों देवियों ने उनकी एक ना सुनी और अंत में तीनो देवो को इसके लिए राजी होना पड़ा। तीनों देवो ने साधु वेश धारण किया तथा अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुंचे। तीनों साधुओं ने कहा कि आप हमे निवस्त्र होकर भोजन कराओगी। अनुसूईया ने साधुओं के शाप के भय से तथा अतिथि सेवा से वंचित रहने के पाप के भय से परमात्मा से प्रार्थना की कि हे परमेश्वर ! इन तीनों को छः-छः महीने के बच्चे की आयु के शिशु बनाओ। जिससे मेरा पतिव्रत धर्म भी खण्ड न हो तथा साधुओं को आहार भी प्राप्त हो व अतिथि सेवा न करने का पाप भी न लगे। परमेश्वर की कृपा से तीनों देवता छः-छः महीने के बच्चे बन गए तथा अनुसूईया ने तीनों को निःवस्त्र होकर दूध पिलाया तथा पालने में लेटा दिया। कालान्तर में दतात्रोय रूप में भगवान विष्णु का, चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म अनुसूईया के गर्भ से हुआ।
पूज्य संत साध्वी विश्वेश्वरी देवी जी ने कहा कि पहले बच्चे प्रातःकाल उठकर माता पिता के पैर छूकर आशीर्वाद लेते थे परंतु अब आधुनिककाल में बच्चे सबसे पहले उठकर मोबाइल को छूते है। यह गलत अवधारणा जन्म ले रही है। बच्चे अब संस्कारविहीन होते जा रहे है। बच्चे को चाहिए कि अपनी मानसिकता को बदलकर प्रातःकाल उठकर माता पिता के पैर छूए।




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