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मां कात्यायनी की शक्ति से परिपूर्ण है विन्ध्यवासिनी माता का विग्रह
नवरात्रि में मां दुर्गा के कात्यायनी स्वरूप की आराधना की जाता है। यह कुण्डलिनी शक्ति के आज्ञा चक्र को जाग्रत करतीं है और उपासक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की एक साथ प्राप्ति होती है। कात्य गोत्र के महार्षि कात्यायन ने अपनी इष्ट मां पराम्बा की कठोर तपस्या करके उन्हें पुत्री के रूप में प्राप्त किया था। इसी कारण मां पराम्बा को कात्यायनी देवी के नाम से भी जाना जाता है।
व्दापर युग में गोपियों ने माता के इसी स्वरूप की आराधना यमुना नदी के किनारे करके भगवान श्रीकृष्ण को पति के रूप में पाने की मनौती मानी थी। इसी कारण इन्हें बृज मण्डल की अधिष्ठात्री देवी भी कहा जाता है। सोने के समान चमकीले स्वरूप की दिव्य आभा बिखेरते हुए माता का चतुर्भुज स्वरूप दो हाथों में तलवार, कमल सुसज्जित है। एक हाथ की अभयदान मुद्रा एवं एक हाथ की वरदान मुद्रा रहने से साधक को जहां संरक्षण प्राप्त होता है वहीं मनोवांछित फल भी मिलता है।
महाराज छत्रसाल की नगरी छतरपुर के उत्तरी व्दार पर सुन्दर सरोवर के किनारे मां विन्ध्यवासिनी मां का प्राचीनतम स्थान है जिसका समय-समय जीर्णोध्दार किया जाता रहा है। इसी मंदिर के विग्रह में मां कात्यायनी की शक्ति स्थापित है। यहां कर की जाने वाली साधना कम समय में ही फल प्रदान करती है। जहां अविवाहित युवतियां भगवान श्री कृष्ण की तरह सर्वगुण संपन्न वर प्राप्ति हेतु आराधना करतीं है वहीं विवाहित महिलायें अपने सौभाग्य की रक्षा की कामना लेकर पूजा-अर्चना करतीं हैं।
मंदिर से जुडे श्रध्दालुओं की मानें तो अनेक साधकों को मां ने कन्या के रूप में दर्शन ही नहीं दिये बल्कि उनकी समस्याओं का रहस्योद्घाटन करते हुए निदान भी किया। कन्या का मंदिर परिसर में अचानक पदार्पण, साधक से उसकी समस्या के बारे में बातें करना और उपाय सुझाकर चला जाना, किसी आश्चर्य से कम नहीं था। साधक ने जब कन्या के व्दारा सुझाये गये उपाय किये तो तत्काल समस्या का समाधान हो गया। तो आइये करें मां कात्यायनी की विधिवत उपासना और एक साथ पायें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का चतुर्भुज वरदान।




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