महंगे दिनों की भरमार-मोदी सरकारः कांग्रेस

कांग्रेस के महासचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मकान ने बुधवार को मौजूदा महंगाई को लेकर केंद्र की मोदी सरकार की घेराबंदी की। उन्होंने मनमोहन सरकार और मोदी सरकार के कार्यकाल में बढ़ी महंगाई के तुलनात्मक आंकड़े पेश करते हुए मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि कुछ सालों में महंगाई काफी बड़ी है जिससे आम आदमी का जीना दूभर हो गया है।

इस घोर संकट के समय में आसमान छूती कीमतें आम लोगों के जले पर नमक छिड़क रही हैं। असंवेदनशील, बेपरवाह मोदी सरकार ने गंभीर आर्थिक मंदी के दौरान भी देशवासियों को आसमान छूती कीमतों के बोझ के नीचे दबा दिया है। देशवासियों के हाथों में नकद धनराशि पहुंचाने की बजाय भाजपा सरकार उन्हें अपनी जरूरत के सामान के लिए ज्यादा मूल्य चुकाने को मजबूर कर रही है।
भारतीय और ज्यादा गरीब हो गए –
यूपीए की पिछली सरकार ने बड़ी मेहनत से 27 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला था, लेकिन वर्तमान सरकार ने उसकी सारी मेहनत पर पानी फेरते हुए 23 करोड़ लोगों को वापस गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिया। अकेले और मई महीने में 2 करोड़ लोगों कीनौकरियां चली गईं, 97 प्रतिशत लोगों को आज कम वेतन मिल रहा है। नौकरी खोने और कम वेतन मिलने के चलते देशवासियों को रिटायरमेंट के लिए बचाकर रखे गए अपने प्राॅविडेंट फंड में से लगभग 1.25 लाख करोड़ रु. निकालने पर मजबूर होना पड़ा।
आर्थिक कुप्रबंधन
जिस समय जीडीपी वृद्धि दर कम होती जा रही हो, ऐसे में सरकार द्वारा मूल्यों में वृद्धि एक जघन्य कृत्य है और इस आर्थिक बर्बादी का कारण केवल कोरोना नहीं है। हमारी अर्थव्यवस्था पर महामारी का साया पड़ने से पहले ही अनेक विपत्तियां आ चुकी थीं- हमारी वृद्धि दर वित्त वर्ष 2017 में 8.2 प्रतिशत से घटकर वित्त वर्ष 2020 में 4.1 प्रतिशत रह गई, यह सब कुछ भयावह नोटबंदी, त्रुटिपूर्ण तरीके से लागू की गई जीएसटी एवं मोदी सरकार की गलत नीतियों के कारण हुआ। पेट्रोल एवं डीजल की दरों में अप्रत्याशित वृद्धि पेट्रोल की कीमतें इतिहास में पहली बार सभी 4 मेट्रो और देश के अन्य 250 से अधिक शहरों में 100 रु. को पार कर गई है।
ऽ 1 अप्रैल, 2021 से 12 जुलाई, 2021 के बीच पेट्रोल एवं डीजल की कीमतें 66 बार बढ़ाई गईं ।
ऽ मोदी सरकार ने अपने शासनकाल के पिछले 7 सालों में एक्साईज ड्यूटी से 25 लाख करोड़ रु. से ज्यादा का मुनाफा कमाया ।
ऽ पिछले 7 सालों में पेट्रोल पर एक्साईज ड्यूटी में 247 प्रतिशत एवं डीजल पर 794 प्रतिशत वृद्धि की गई। पेट्रोल पर एक्साईज में प्रतिलीटर वृद्धि पिछले 7 सालों में 23.42 रु. प्रतिलीटर और डीजल पर 28.24 रु. प्रतिलीटर की गई ।

पेट्रोल

ऽ 2014-15 में पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी से अर्जित आय 1,72,000 करोड़ रु. थी, जिसे 2020-21 में बढ़ाकर 4,53,000 करोड़ रु. कर दिया है ।
ऽ भारत सरकार पेट्रोल की बिक्री से 32 रु 90 पैसे प्रति लीटर वसूल करती है, जिसमें 20 रुपए 50 पैसे सेस के रूप में लिया जाता है। सेस से कमाया गया मुनाफा राज्य सरकारों के साथ साझा नहीं किया जाता। इसलिए भारत सरकार पेट्रोल बेचकर जो 62 प्रतिशत मुनाफा कमाती है, उसमें से एक पैसा भी राज्य सरकारों को नहीं मिलता है। डीजल पर केंद्र सरकार 31 रूपए 80 पैसे पति लीटर कमाती है, जिसमंे से 22 रू. प्रतिलीटर सेसे के रूप में लिया जाता है। यानि डीजल पर सेसे के रूप में भारत सरकार द्वारा कमाए गए 69 प्रतिशत मुनाफे का एक पैसा भी राज्य सरकारों को नहीं मिलता।
ऽ राज्यामें में कीमतें कम करने के लिए अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि राज्य सरकारों को अपना वैट कम करना चाहिए, 2020-21 में सभी राज्यों ने मिलकर 2.17 लाख करोड़ रू. वैट के रूप में एकत्रित किए, जो कि राज्य सरकार द्वारा एक्साईज के रूप में एकत्रित किए गए।
ऽ 4.53 लाख करोड़ रूपये के मुनाफे का केवल 48 प्रतिशत है। यह बात भी गौरतलब है कि भारत सरकार ने राज्यों की तुलना में बहुत ज्यादा अनुपात में एक्साईज शुल्क बढ़ाया है, जिसके कारण महंगाई में अत्यधिक वृद्धि हुई। इसलिए कीमतों को कम करने के लिए भारत सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी में की गई वृद्धि को कम किया जाना जरूरी है।
ऽ पेट्रोल एवं डीजल पर अत्यधिक एक्साईज शुल्क के नितांत नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं, क्योंकि इससे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से मध्यम आय वर्ग एवं निम्न आय वर्ग के लोग प्रभावित होते हैं।
ऽ डीजल की ऊंची कीमतें किसान विरोधी भी हैं, क्यांेकि वो प्रत्यक्ष रूप से डीजल के उपभोक्ता हैं और डीजल के मूल्यों में वृद्धि का उन पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
ऽ कच्चे तेल का प्रति बैरल औसत मूल्य 2011-12 से 2013-14 के दौरान 105 अमेरिकी डाॅलर प्रति बैरल से 112 अमेरिकी डाॅलर प्रति बैरल के बीच रहा, जब मई 2014 में कांगे्रस सरकार का कार्यकाल समाप्त हुआ, तब कच्चे तेल की कीमत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 108 डाॅलर प्रति बैरल थी, लेकिन देश में पेट्रोल व डीजल का प्रतिलीटर मूल्य क्रमशः 71.51 रू. और 57.28 रू. था।

ऽ पिछली यूपीए सरकार डीजल की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए डी.जल पर नुकसान उठाया करती थी, क्योंकि डीजल की बढ़ी कीमतों का महंगाई एवं परिवहन की लागत पर सीधा असर पड़ता है। पिछली यूपीए सरकार ने 2013-14 में 1.64 लाख करोड़ एवं 2012-13 में 1.42 लाख करोड़ का अंडर रिकवरी (पेट्रोल को बाजार मूल्य से कम में बेचने से होने वाले नुकसान) वहन की थी, किंतु मोदी सरकार ने डीजल पर अंडर रिकवरी को सितंबर 2014 में मूल्यों में वृद्धि कर के शून्य कर दिया।
ऽ मोदी सरकार के शासनकाल में घरेलू तेल उत्पादन में गिरावट
ऽ घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन यूपीए-1 और यूपी-2 के दौरान 23.4 प्रतिशत था जो 2014 में 2020 के दौरान कम होकर 15.8 प्रतिशत रह गया। मोदी सरकार के कार्यकाल में यह प्रतिशत तेजली से गिरा है। भारत ने 2020 में पिछले 18 सालों से सबसे कम कच्चे तेल का उत्पादन किया। (नीचे दिया गया ग्राफ देखें)
ऽ मोदी सरकार अपनी अक्षमता के लिए पिछली सरकारों को दोषी ठहराती है, लेकिन सच्चाई यह है कि मोदी सरकार इस झूठ के पीछे अपना चेहरा छिपाने की कोशिश कर रही है। तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) की घरेलू कच्चे तेल के उत्पादन में 63 प्रतिशत हिस्सेदारी है, लेकिन इसके लिए पूंजीगत आवंटन जो 2020-21 में 32,501 करोड़ रू. था, वो 2021-22 के वार्षिक बजट में 8 प्रतिशत की गिरावट के साथ 29,800 करोड रू. हो गया है। सरकारी तेल एवं प्राकृतिक गैस कंपनियों में वर्तमान निवेश 1,04,870 करोड़ रू. है, जो पिछले बजट में निर्धारित किए गए 1,07, 154 करोड़ रू. के मुकाबले कम है। इससे स्पष्ट होता है कि मौजूदा भाजपा सरकार घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के प्रति गंभीर नहीं है।
ऽ तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम का विनाश: कम कैपिटल आउटले, कैश केरिजर्व में निरंतर निरावट के कारण ओएनजीसी ने तेल की खोज एवं विकास कार्यों में काफी कमी कर दी है। ओएनजीसी की वार्षिक वित्तीय लागत वित्त वर्ग 2014 में 0.36 करोड़ रू. से बढ़कर वित्त वर्ष 2020 में 2,824 करोड़ रू. हो गई, जिससे इसकी आर्थिक स्थिति को भारी झटका लगा। हिंदुस्तान पेट्रोलियम काॅर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) में नियंत्रणकारी हिस्सेदारी हासिल करने और गुजरात स्टेट पेट्रोलियम काॅर्पोरेशन (जीएसपीसी) केकेजी बेसिन गैस ब्लाॅक में अधिकांश अंश खरीदने के कारण ओ एनजीसी पर 24,881 करोड़ रू. के कर्ज का बोझ हो गया, जिसके चलते कंपनी को तेल कुओं में खोज कार्यों के खर्च में भारी कटौती करनी पड़ी। ओएनजीसी द्वारा तेल कुओं मंे खोज का कार्य का खर्च वित्त वर्ष 2014 में 11,687 करोड़ रू. से गिरकर वित्त वर्ष 2020 में 4,330 करोड़ रू. रह गया।

कांगे्रस की पिछली सरकारों पर दोष मढ़ने की कोशिश कर रही है मोदी सरकार
ऽ भाजपा के विभिन्न मंत्री व प्रवक्ता पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों का दोष यूपीए शासन के दौरान जारी किए गए तेल बाॅन्ड्स पर डालने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन कीमतों में हो रही बढ़ोत्तरी के खिलाफ उठ रहे सवालों से बचने के लिए एक गैर तथ्यात्मक कोशिश है।
ऽ तेल बाॅन्ड जारी करने का उद्देश्य अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ जाने पर उपभोक्ता को पेट्रोल व डीजल की ऊंची कीमतों के चलते पड़ने वाले अत्याधिक वित्तीय भार से सुरक्षा दिलाना था।
ऽ साल 2005 से 2010 के बीच यूपीए सरकार ने केवल 14 लाख करोडऋ रू. के तेल बाॅन्ड जारी किए। सच्चाई यह हे कि पिछले 6 साल 9 महीने में (1 अप्रैल, 2014 से 31 दिसंबर 2020 के बीच) केंद्रीय खजाने में तेल बाॅन्ड्स के कारण उत्पन्न भार पेट्रोलियम सेक्टर के कुल योगदान का 2.8 प्रतिशत है। दूसरे शब्दों में पिछले 6 साल 9 महीनों में भारत सरकार ने इन बाॅन्ड्स की मूल राशि एवं ब्याज के रूप में 71,198 करोडऋ रू. अदा किए हैं, जबकि देश के नागरिकों से इसके लिए 25 लाख करोड़ रूऋ वसूले गए हैं, यानि एकत्रित की गई राशि केवल 2.8 प्रतिशत दिया गया।


वस्तुओं के मूल्य की तुलना (साल 2014 बनाम साल 2021) इनके मूल्य –
फुल क्रीम मिल्क – 44 रू. (2014)/ 57 रू. (2021)
टोन्ड – 34 रू. (2014)/ 47 रू. (2021)
डबलटोन्ड – 32 रू. (2014)/ 41 रू. (2021)
देसी घी – 380 रू. (2014)/ 600 से 800 रू. (2021)
दाल –
तुअर – 64 रू. (2014)/ 130 रू. – 150 रू. (2021)
उड़ददाल – 59 रू. (2014)/ 145 रू. (2021)
मूंगदाल – 65 रू. (2014)/ 100 रू. से 110 रू. (2021)
सरसो तेल – 60 रू. से 70 रू. (2014)/ 175 रू. से 200 रू. (2021)
चाय – 116 रू. (2014)/ 145 रू. (2021)
खाद्य तेलों का माॅडल रिटेल मूल्य (सबसे आम) पिछले एक साल में 25 प्रतिशत से 50 प्रतिशत बढ़ गया। पीएमसी (प्राइस माॅनिटरिंग सेल) डेटा प्रदर्शित करता है कि माॅडल वनस्पति मूल्य (पैक्ड) पिछले एक साल में 80 रू. प्रति लीटर से बढ़कर 120 रू. प्रति लीटर हो गया और सूरज मुखी तेल के एक लीटर का पैक मार्च, 2021 से 150 रू. में बिका, जो एक साल पहले 110 रू. का था।
एलपीजी (रसोई गैस) –
अप्रैल, 2014 में एलपीजी का मूल्य 414 रू. प्रति सिलंेडर था, जो इस समय बढ़कर लगभग 850 से 915 रू. प्रति सिलंेडर हो गया है। पिछले 7 साल में एलपीजी का मूल्य भारत सरकार ने दो गुना बढ़ा दिया। पिछले 7 महीनों में एलपीजी के दाम 6 बार में 240 रू. बढ़ाए गए। एलपीजी सिलेडर के दाम नवंबर 2020 में 594 रू. थे जो बढ़ाकर लगभग 850 रू. से 915 रू. कर दिए गए। देश में लगभग 29 करोड़ लोग एलपीजी का इस्तेमाल करते हैं। आज कितने उज्जवला लाभार्थी एलपीजी सिलेंडर 915 रू. प्रति सिलेंडर में खरीद सकते हैं? सच्चाई यह है कि साल 2020 में हमारे देश मंे 23 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिए गए एवं 97 फीसदी लोग और ज्यादा गरीब हो गए।
एलपीजी के दाम सउदीअरब को एलपीजी दामें के आधार पर निर्धारित होते हैं, जो इस समय 523 अमेरिकी डाॅलर प्रति मीट्रिक टन है, यानि यदि एक डाॅलर 73.94 रू. का मानें तो इसका मूल्य 38,670.62 रू. प्रति मीट्रिक टन होगा। इसका मतलब है कि एलपीजी का अंतर्राष्ट्रीय मूल्य 38.67 रू. प्रति किलोग्राम है। घरेलू गैस के सिलेंडर में 14.2 किलोग्राम गैस होती है, यदि इसके बेस मूल्य की गणना की जाए, तो एक सिलेंडर 549.11 रू. का पडे़गा। इस मूल्य में मोदी सरकार 5 प्रतिशत जीएसटी, बोटनिंग का शुल्क, एजेंसी कमीशन, परिवहन शुल्क लगाती है और फिर कंपनियों का मुनाफा जोड़कर देश की गरीब जनता से प्रति सिलेंडर से 850 से 915 रू. की बड़ी कीमत वसूली जाती है।
जब यूपीए की सरकार ने आफिस छोड़ा था, जब यूपीए सरकार फ्यूल सब्सिडी के लिए हर साल 1,42,000 करोड़ रू. दिया करती थी। इसलिए यह आवश्यक है कि आज की सरकार इस बात को समझे कि पेट्रोल-एलपीजी के दाम हमारी अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव डालने वाले हैं। आज हम 6.3 प्रतिशत का इन्फ्लेशन स्तर देख रहे हंै, जो सीधा देश की आम जनता पर असर डालता है। प्रति सिलंेडर मूल्य में 240 रू. की बढ़ोत्तरी विनाशकारी है।
कृषि महंगाई –
भारत में 140 करोड़ नागरिक महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिकमंदी और कोरोना महामारी की मोदी निर्मित आपदाओं से जूझ रहे हैं। तेल की कीमतों में प्रति दिन हो रही वृद्धि ने समस्याओं को और ज्यादा बढ़ा दिया है और हर घर के लिए जीवन यापन करना मुश्किल होता जा रहा है। इस प्रकार मोदी सरकार द्वारा की गई डीजल, खाद, बीज, उर्वरक, बिजली, कृषि के उपकरणों के मूल्यांे में वृद्धि ने किसानों की खेती की लागत में लगभग 20,000 रू. प्रति हेक्टेयर की बढ़ोत्तरी कर दी है।
देश के पिछले 73 सालों के इतिहास में पहली बार खाद पर 5 प्रतिशत, कीटनाशक पर 18 प्रतिशत जीएसटी है, टैªक्टर्स एवं खेती के उपकरणों पर 12 प्रतिशत टैक्स लगा दिया गया है।
क्या पेट्रोल व डीजल के मूल्य अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों के अनुसार परिवर्तनशील है।
नहीं, यह सब चुनाव की समय सारणी पर निर्भर है। निम्न लिखित उदाहरण देखें, जब कच्चे तेल के मूल्यों में वृद्धि के बाद भी चुनावों के दौरान पेट्रोल और डीजल के दाम में कमी की गई।
[2:24 pm, 14/07/2021] Vipin: आज जो महंगाई बढ़ी है वह मांग बढ़ने के कारण नहीं बढ़ी है, बल्कि उपभोक्ताओं की मांग में कमी आयी है। यह महंगाई अधिक तरलता (लिक्विडिटी) या लोगों के हाथ में अधिक नगदी पहुंचने अर्थात लोगों की क्रय शक्ति (परचेस पाॅवर) बढ़ने से नहीं बढ़ी है। यह महंगाई सीधे तौर पर मोदी सरकार की गलत नीतियों और अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन की वजह से बढ़ी है।
मोदी सरकार जनता के भारी विरोध के बावजूद भी पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दाम लगातार बढ़ा रही है। आज दिल्ली में पेट्रोल 100.91 रू. प्रति लीटर, डीजल 89.88 रू. प्रति लीटर पहुंच गया है। मुंबई में पेट्रोल 106.93 रू. और डीजल 97.46 रू. प्रतिलीटर पहुंच गया है। घरेलू गैस के सिलेण्डर की कीमत दिल्ली में 835 रू., और पटना में तो यह 933 रू. तक पहुंच गया है।
1) इन कीमतांे मंे वृद्धि का स्पष्टीकरण यह नहीं हो सकता कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अधिक हैं। आज कच्चे तेल की कीमत लगभग 75 डाॅलर प्रति बैरल है। कांग्रेस की सरकार के समय जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 125 डाॅलर प्रति बैरल थी तब भी कांगे्रस की सरकार पेट्रोल 65 रू. और डीजल 44 रू. प्रति लीटर उपलब्ध करा रही थी। आज की पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि का एक मात्र कारण है मोदी सरकार का एक्साईज ड्यूटी और सेस में बेतहाशा वृद्धि करना। केंद्र सरकार पेट्रोल पर 33 रू. और डीजल पर 32 रू. प्रतिलीटर कर लगाती है। इन करों के माध्यम से केंद्र सरकार लगभग 4.2 लाख करोड़ रू. प्रति वर्ष देश के नागरिकों की जेब से निकाल रही है।
2) इंपोर्ट ड्यूटी – बीते कुछ वर्षों में मोदी सरकार ने रूपये की कीमत डाॅलर के मुकाबले गिरने के बावजूद भी बढ़ी संख्या में वस्तुओं पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ायी है। इसकी वजह से आवश्यक वस्तुओं के दाम में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। जैसे पाॅम आईल, दालें, और घरेलू उपभोग की वस्तुओं में।
3) तर्कहीन जीएसटी दरें – मोदी सरकार ने एक देश एक कर के नाम पर जीएसटी की अलग-अलग दरें देश पर थोप रखी हैं। मोदी सरकार ने दैनिक उपयोग की चीजों में 12 से 18 प्रतिशत तक का भारी भरकम कर लगा रखा है। जैसे टूथ पेस्ट, प्रसाधन का सामान, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ (प्रोसेस्ड फूड्स), घरेलू उपकरण इत्यादि पर। जीएसटी की ऊंची दरों का साफ अर्थ है कि अंतिम माल की कीमतों मंे वृद्धि (फायनल गुड्स)।
4) कांगे्रस पार्टी की मांग है कि केंद सरकार तुरंत पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों में कमी करे साथ ही आवश्यक वस्तुओं की इंपोर्ट ड्यूटी कम करे, ताकि महंगाई एवं दैनिक उपभोग की वस्तुआंे की कीमतों में कमी की जा सके। साथ ही कांगे्रस पार्टी यह भी मांग करती है कि उन उपभोक्ता वस्तुओं की कीमत जो बड़ी मात्रा मंे उपभोग की जा रही है उनकी जीएसटी दरें भी तुरंत कम की जायें। हमें पूरा विश्वास है कि केंद्र सरकार के उक्त कदमों से देश की जनता को महंगाई से राहत मिलेगी।

5) मुद्रा स्फीति की दर – सरकार की ओर से आरबीआई को दोनों तरफ दो फीसदी की मार्जिन के साथ खुदरा महंगाई दर 4 फीसदी पर रखने के लिए निर्देशित किया गया था। मगर खुदरा महंगाई की दर 6 प्रतिशत की ऊपरी सीमा के भी बाहर चली गई। एनएसओ द्वारा हाल ही में जारी की गई प्रेस रिलीज में बताया गया है कि यह दर 6.26 प्रतिशत है। शहरी कंज्यूमर प्राईज इंडेक्स जो कि मई महीने में 5.91 प्रतिशत था वह जून में 6.37 प्रतिशत पर पहुंच गया है। इसी प्रकार कोर इंफ्लेशन (मूल स्फीति) 5.5 प्रतिशत से बढ़कर 5.8 प्रतिशत हो गया है।
6) खाद्य वस्तुआंे की महंगाई 5.58 प्रतिशत है, दालों की महंगाई दर 10.01 प्रतिशत है, फलांे की महंगाई दर 11.82 प्रतिशत है, परिवहन की महंगाई दर 11.56 प्रतिशत है, ईंधन और बिजली की महंगाई दर 12.68 प्रतिशत है। इसी प्रकार आॅईल और फेट्स की महंगाई दर 34.78 प्रतिशत तक पहुंच गई हैै।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Khabar News | MP Breaking News | MP Khel Samachar | Latest News in Hindi Bhopal | Bhopal News In Hindi | Bhopal News Headlines | Bhopal Breaking News | Bhopal Khel Samachar | MP News Today