भोपाल विलीनीकरण दिवस पर वेबिनार का आयोजन

जून, 1949 को प्रजा मंडल के अथक प्रयासों के बाद भोपाल का भारत में विलीनीकरण हुआ था और भोपाल में पहली बार तिरंगा फहराया गया था। लगभग दो वर्षों तक चले इस आन्दोलन में संघ के स्वयंसेवकों समेत आम जनता ने बढ़ चढ़ कर सहयोग किया था। इस अवसर पर विश्व संवाद केंद्र, मध्यप्रदेश एवं भाई उद्धव दास मेहता स्मृति न्यास द्वारा वेबिनार का आयोजन किया गया था।

इस वेबिनार में वरिष्ट पत्रकार श्री रमेश शर्मा, भारतीय इतिहास संकलन समिति से जुड़े इतिहासकार श्री राजीव चौबे एवं युवा पत्रकार प्रखर श्रीवास्तव वक्ता के तौर पर उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व न्यायधीश श्री अशोक जी पाण्डेय ने की। ऑनलाइन स्ट्रीमिंग के माध्यम से आयोजित इस संगोष्ठी का विषय ‘भोपाल की स्वतंत्रता-संघर्ष और सफलता’ था, जिसमें सैंकड़ों के संख्या में युवा एवं भोपाल के बुद्धिजीवी जुड़े।

युवा पत्रकार प्रखर श्रीवास्तव ने चर्चा करते हुए बताया कि किस तरह भोपाल के नवाब ने पाकिस्तान के आन्दोलन को हवा दी और जब भारत आज़ाद हुआ तो उन्होंने पाकिस्तान में शामिल होने का रास्ता चुना। उन्होंने इतिहास की अनेक पुस्तकों का सन्दर्भ देते बताया की आजादी से पहले हुए प्रांतीय चुनावों में अधिकतर मुस्लिम आरक्षित सीटों में मुस्लिम लीग जीती। जिससे पाकिस्तान के मांग को बल मिला।

भारतीय इतिहास आंकलन समिति से जुड़े वरिष्ट इतिहासकार श्री राजीव चौबे जी ने भोपाल के विलीनीकरण के लिए चलाये गए आन्दोलन के विषय में विस्तार से चर्चा की और रायसेन में हुए गोलीकांड को जलियांवाला बाग़ के समतुल्य बताया। उन्होंने भोपाल के नवाब द्वारा यहाँ कि बहुसंख्यक आबादी पर किये जा रहे अत्याचारों की भी चर्चा की, उन्होंने यह आग्रह किया कि भोपाल विलीनीकरण दिवस के साथ साथ बोरास गोलीकांड के दिवस पर उन शहीदों को भी स्मरण किया जाना चाहिए जिन्होंने भोपाल की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण दे दिए।

वरिष्ट पत्रकार श्री रमेश शर्मा जी ने भोपाल के पुरातन इतिहास एवं वैदिक काल के साथ भोपाल के संबंधों की चर्चा की। उन्होंने बताया कि भोपाल तब से अस्तित्व में हैं जब से इस भूमि पर मानव सभ्यता की शुरुआत हुई है। श्री विष्णु वाकणकर जी ने भोपाल के श्यामला हिल्स क्षेत्र में लाखों वर्ष पुराने शैलचित्रों की खोज की थी, जो की भोपाल के गौरवमयी इतीहास की गवाही देती हैं। उन्होंने बताया की भोपाल पहले शिक्षा का केंद्र था और यहाँ संस्कृत के विद्यालय थे।

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