भक्ति संगीत और ‘ढिमरयाई नृत्य’ की प्रस्तुति

एकाग्र ‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत आज आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा श्री रुद्रकान्त ठाकुर एवं साथी, सिवनी ने ‘भक्ति संगीत’ और श्री लीलाधर रैकवार एवं साथी, सागर ने ‘ढिमरयाई नृत्य’ की प्रस्तुति दी |  

          प्रस्तुति की शुरुआत श्री रुद्रकान्त ठाकुर और साथियों द्वारा ‘भक्ति संगीत’ से हुई, जिसमें- गणेश वंदना, जय महाकाली हो, लट खोल के नाचो मेरी माँ, मान अकबर का घटाया हैं, शंकर चौड़ा रे महामाई, लोट भरत घर जाओ, मैया रोहित नैना खोलियो हो एवं अम्बा माई की चुनरिया आदि भक्ति गीत प्रस्तुत किये|   

          मंच पर कोरस में- सुश्री रानी शिववंशी और वीणा शिववंशी, की- बोर्ड पर- श्री राजेश चौहान, ऑक्टोपैड पर- श्री राजा निखारे, ढोलक पर- श्री जितेश दुबे और श्री खुमान सिंह ने संगत दी। रुद्रकांत ठाकुर विगत तीस वर्षों से पारंपरिक जसों की प्रस्तुति देते आ रहे हैं। आपने  देश के विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां दी हैं ।  

          दूसरी प्रस्तुति श्री लीलाधर रैकवार एवं साथी, सागर द्वारा ‘ढिमरयाई नृत्य’ की हुई- 

ढिमरयाई नृत्य ढीमर जाति का पुरुष प्रधान नृत्य है, यह वर्षभर किया जाने वाला वारहमासी लोकनृत्य है| ढिमरयाई समुदाय के लोगों द्वारा यह नृत्य शादी-विवाह, जन्म उत्सव एवं देवी उत्सव आदि में किया जाता है, इसमें नर्तक पैरों में घुंगरु, गमछा, धोती पहन कर सारंगी के साथ गायन व नृत्य करते हैं| इसमें सारंगी, लोटा, खंजरी, खरताल, जूला और ढोलक आदि वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता है |  रैकवार इस नृत्य को विगत तेईस वर्षों से करते आ रहे हैं, आप देश के विभिन्न मंचों पर अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं|   

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