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बचपन बचाओ आंदोलन पर उठे सवाल, रेस्क्यू किए बच्चे पहुंचे मदरसे
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्टेशन पर 23 बच्चे जिन्हें बाल श्रम एवं तस्करी के संदेह के आधार पर रेलवे चाइल्ड लाइन, राजकीय रेलवे पुलिस (जीआरपी) और रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) की मदद से बचपन बचाओ आन्दोलन((बीबीए) ने रेस्क्यू तो करवाए लेकिन इसके बाद इन बच्चों को लेकर शासन-प्रशासन के साथ बच्चों के कल्याण के लिए बनाई गई बाल कल्याण समिति भी कितनी गैर जिम्मेदार हो सकती है, इसका पता इस बच्चों में पकड़े गए मुस्लिम बच्चों के मदरसों को सौंप देने के रूप में सामने आया है।
उल्लेखनीय तौर पर बताया जाता है कि इन बच्चों को मदरसे में छोड़ने का दबाव इतना अधिक था कि महिला बाल विकास विभाग ने तुरन्त ही बाल कल्याण समिति ऑफिस में इन बच्चों की काउंसलिंग करने अपना एक अधिकारी भेजा। इसने भी मदरसों को बच्चे सौंपे जाने को लेकर अपनी सहमति जताई और नियमों का पालन ना करते हुए बिना माता-पिता के इन मदरसों को उन्हें सौंप दिया गया । नियमानुसार माता-पिता की सहमति पत्र के बाद ही किसी के सुपुर्द बच्चे किए जाते हैं । जबकि इस पूरे प्रकरण में बच्चों को उन मौलवियों के हवाले कर दिया गया है, जिनके बारे में अब तक यह भी नहीं पता कि वे कितना सच बोल रहे थे।
कैलाश सत्यार्थी के ट्वीट के बाद शासन और सीडब्ल्यूसी की गलती सामने आई
दरअसल, सामाजिक सेवा के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार प्राप्त, बचपन बचाओ आन्दोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी ने जब अपने ट्वीटर हेंडल से इन बच्चों को लेकर एक ट्वीट किया और इस मामले में जानकारी जुटाना शुरू किया तब पता चला कि कितनी बड़ी चूक शासन स्तर पर ही नहीं बल्कि बाल कल्याण समिति भोपाल जिसे कि प्रथमपीठ न्यायाधीश की शक्तियां भी मिली हुई हैं वह कर बैठी है।
इस संबंध में कैलाश सत्यार्थी ने अपने ट्वीट के माध्यम से बताते हुए कहा कि ‘महामारी के परिणामस्वरूप बाल तस्करी अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई प्रतीत होती है। रात भर चले ऑपरेशन में, मेरी संस्था बचपन बचाओ आन्दोलन (बीबीएइंडिया) सहकर्मियों ने जीआरपी और आरपीएफ की मदद से भोपाल में 23, विजयवाड़ा में 14 और कोलकाता में 13 बच्चों को रेलवे स्टेशनों से बचाया।’
मदरसे से जुड़े लोगों ने बनाया दबाव
उन्होंने आगे अपने इस ट्वीट में इसके लिए केंद्रीय रेल मंत्री पियूष गोयल और रेलवे सेवा को धन्यवाद भी दिया है । लेकिन जब इस पूरे प्रकरण में भोपाल के स्तर पर तहकीकात की गई तो सामने आया कि इन बच्चों को रेस्क्यू तो किया गया, पर बाद में जब चाइल्ड लाइन ने बाल कल्याण समिति के सामने प्रस्तुत किया तो वहां कई लोग जो मदरसे से ताल्लुक रखते थे आ गए और उन्होंने कहा कि बच्चों को हमें सौंपो । क्योंकि यह अपने घर पटना से चलकर मदरसे में पढ़ाई करने भोपाल आए हैं । https://twitter.com/k_satyarthi/status/1412299721335480347
इसके बाद उनका कहा मानकर बाल कल्याण समिति ने इन बच्चों में से मुस्लिम बच्चों को दो मदरसों को सौंप दिया, जबकि इनमें जो हिन्दू बच्चे साथ में रेस्क्यू हुए उन्हें एक संस्था में रख दिया गया है। अब इनके माता-पिता के आने का इंतजार किया जा रहा है । जबकि नियमानुसार जब बच्चे रेस्क्यू किए जाते हैं तो उन्हें परिजनों को ही सौंपा जाता है, इस बीच वे किसी संस्था में रहकर अपनी आगे की पढ़ाई एवं अन्य कार्य करते हैं। लेकिन यहां मुस्लिम बच्चों के साथ इस नियम का कोई पालन नहीं किया गया।
जब पूरे मामले में बाल कल्याण समिति का पक्ष जानना चाहा तो सदस्यों में से किसी से भी बात नहीं हो पाई है। वहीं दूसरी ओर बचपन बचाओ आंदोलन इन बच्चों के पुनर्वास के लिए कोई योजना सामने रखता नहीं दिखा । रेस्क्यू करते समय भी बचपन बचाओ आंदोलन का कोई व्यक्ति सामने दिखाई नहीं दिया था, सिर्फ बचपन बचाओ आन्दोलन की सूचना के आधार पर रेलवे चाइल्ड लाइन, आरपीएफ, आरपीएफ सक्रिय हुए और बच्चों को भोपाल स्टेशन पर उतारा गया।
इस तरह खड़े हुए कई सवाल
सूत्रों के हवाले से पता चला है कि इनमें से कइयों के टिकिट इंदौर व अन्य स्थानों तक जाने के भी थे, जिन्हें कि इन मदरसों के हवाले कर दिया गया । बड़ा प्रश्न है कि जब चाइल्ड लेबर के मामले में बच्चे रेस्क्यू किए गए थे तो फिर यह मदरसे में कैसे पहुंच गए । इसके बाद बाल कल्याण समिति के सामने जब यह बच्चे प्रस्तुत किए गए तो बच्चे उनके माता-पिता को क्यों नहीं सौंपे गए। यदि माता-पिता को भोपाल आने में समय लगता तो उनका इंतजार किया जाता, जैसा कि हिन्दू बच्चों के मामले में हो रहा है, इन बच्चों को छोड़ने की इतनी जल्दी क्यों की गई। कहीं ये बच्चे बांग्लादेशी तो नहीं थे, क्या इसकी जांच नहीं होना चाहिए?
गौरतलब है कि एक तरफ बचपन बचाओ आन्दोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी का कहना है कि देश में चाइल्ड लेबर, बाल तस्करी बहुत बढ़ गई है तो दूसरी ओर सीडब्ल्यूसी के निर्णय को माने तो यह बच्चे मदरसे में पढ़ने वाले हैं और गृह क्षेत्र से मदरसे में वापस आए हैं । इनमें से सच क्या है, आज बच्चों के मामले में यह जरूरी सच सब तक पहुंचने की है।
बतादें कि बाल कल्याण समिति को बालकों की देखरेख, संरक्षण, उपचार, विकास और पुनर्वास के मामलों का निपटारा करने और उनकी मूलभूत आवश्यकताओं तथा संरक्षण के लिए उपबंध करने का प्राधिकार दिया गया है । यह समिति इस अधिनियम के अधीन बालकों की सुरक्षा और भलाई से संबंधित और उसको प्रभावित करने वाले सभी मुद्दों की जांच करती है।




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