निमाड़ी लोक ‘गायन’ गायन एवं भील ‘जनजातीय नृत्य’ की प्रस्तुति

एकाग्र ‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा सुश्री मनीषा शास्त्री एवं साथी महेश्वर का निमाड़ी लोक ‘गायन’ गायन एवं कैलाश सिसोदिया एवं साथी, धार द्वारा भील ‘जनजातीय नृत्य’ की प्रस्तुति हुई | 

प्रस्तुति की शुरुआत सुश्री शास्त्री के गायन से हुई जिसमें सर्वप्रथम विवाह के प्रारंभ में गणेश पूजन पर गाई जाने वाली गणेश वंदना-“पांचई कंचोला पांचई अमरित कुंड भरिया हो” पश्चात सगाई गीत- “राजा जनक घर शुभ घड़ी आती”, निमंत्रण गीत- “सुनो हो सरसती ,सुनो हो गणपति”, बन्ना बनर्जी- विवाह समारोह में गाये जाने वाले गीत- “कहो तो बना”, विवाह गीत- “कंकु री टीकी म्हारी रलई-रलई जाये”, जच्चा गीत- “हम तो बणी ठणी न आया हो ब्यायण जी” एवं विदाई- “फुलडा विणंती  तू तो चली हो लाड़कली” आदि गीत प्रस्तुत किये|  

          प्रस्तुति में मंच पर –सहगायिका के रूप में श्रीमती संगीता सोहनी एवं सुश्री सलोनी गीते, हारमोनियम पर- श्री नरेन्द्र गीते, तबले पर- श्री प्रवीण गीते, झांझ पर- श्री जगदीश पाटीदार, खंजरी पर- श्री अक्षत गीते एवं ढोलक पर श्री अवी गीते ने संगत दी | 

          सुश्री शास्त्री आकाशवाणी इंदौर को बी हाई ग्रेड कलाकार हैं, आपको गायन अपने पिता श्री काशीनाथ गीतेजी से संस्कार रूप में प्राप्त हुआ, आप दूरदर्शन एवं विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों पर अपने लोकगायन की सफल प्रस्तुति दे चुकी हैं| 

          दूसरी प्रस्तुति श्री कैलाश सिसोदिया एवं साथी, धार द्वारा भील जनजातीय नृत्य की हुई जिसमें भगोरिया एवं डोहा नृत्य का प्रदर्शन किया गया| 

          भील मध्यप्रदेश की झाबुआ, अलीराजपुर, धार और बड़वानी क्षेत्र में निवास करने वाली प्रमुख जनजाति है। फागुन मास में होली के सात दिन पूर्व से आयोजित होने वाले हाटों में पूरे उत्साह और उमंग के साथ भील युवक एवं युवतियों द्वारा पारंपरिक रंग-बिरंगे वस्त्र, आभूषण के साथ नृत्य किया जाता है, जिसे भगोरिया नृत्य कहते हैं| फसल कटाई के पश्चात् वर्षभर के भरण-पोषण के लिए समुदाय इन हाटों में आता है| भगोरिया नृत्य में विविध पदचाप समूहन पाली, चक्रीपाली तथा पिरामिड नृत्य मुद्राएँ आकर्षण का केंद्र होती हैं| रंग-बिरंगी वेशभूषा में सजी-धजी युवतियों का श्रृंगार और हाथ में तीरकमान लेकर नाचना ठेठ पारंपरिक व अलौकिक संरचना है|    

          डोहा मान्यता से सम्बंधित उत्सव है| मनोकामना पूर्ण होने पर दीपावली के समय पांच दिन तक घर-घर जाकर डोहा खेला जाता है| गाँव के युवक-युवतियाँ रात्रि में घर-घर जाकर ढोल, थाली और पावली की धुन पर नृत्य गान करते हैं | 

          नृत्य प्रस्तुति में श्री अजय, प्रताप सिंह, कलम सिंह, ईडा, विरेन्द्र, रेखा, रेलम, सरिता, सागर, रविना, नदान सिंह, कैलाश, भूरसिंह, भुरला, चतर सिंह एवं भेरू ने नृत्य में संगत दी |      

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