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दीपाली दाते-समीर दाते की सुमधुर सुगम-संगीत प्रस्तुति
संस्कृति विभ्ााग द्वारा 18 दिसम्बर को जनजातीय संग्रहालय में उत्तराधिकार श्रृंखला के तहत् आयोजित सुगम संगीत सभ्ाा में मुम्बई से पधारे समीर दाते एवं सुश्री दीपाली दाते ने समधुर अंदाज में नये-पुराने गीतों की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का आगाज समीर दाते द्वारा जब वी मेट फिल्म के ”आओगे जब तुम ओ साजना”” गीत से की गई। इस गीत के बाद सुश्री दीपाली दाते ने बहारों के सपने फिल्म का सुप्रतिष्ठित गीत ”क्या जानू सजन होती है क्या गम की शाम”” की प्रस्तुति दी।
दोनों ही कलाकारों ने मंच पर आते ही पहली बार भ्ाोपाल बुलाने पर भ्ाोपालवासियों के साथ ही संस्कृति विभ्ााग का हृदय से आभ्ाार व्यक्त किया। इसके पश्चात् संस्कृति संचालनालय की उप संचालक एवं आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी की निदेशक श्रीमती वंदना पाण्डेय द्वारा दोनों ही कलाकारों एवं साथी कलाकारों का फूल गुच्छ भ्ोंट कर स्वागत किया गया।
नये-पुराने फिल्मों गीतों की प्रस्तुति दोनों ही कलाकारों ने दी, जिनमें तुम ही हो-आशिकी-2, चौदवी का चांद हो या शबाब हो, न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जाने, मेरे सामने वाली खिड़की में इक चांद का टुकडा, झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में, मेरा नाम चिन-चिन चू, सुन रहा है न तू कि रो रही हूं मैं आदि शामिल रहे।




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