जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, मप्र संस्कृति परिषद् की ओर से तीन दिवसीय शोध संगोष्ठी “घुमन्तू समुदायः वाचिक परम्पराएँ” विषय पर आयोजित की जा रही है। संगोष्ठी 19 से 21 अक्टूबर तक जनजातीय संग्रहालय के सभागार में आयोजित की जायेगी। शोध संगोष्ठी की जानकारी देते हुए अकादमी निदेशक डॉ. धर्मेंद्र पारे ने बताया कि नागर, लोक और आरण्यक समुदायों की संस्कृति, ज्ञान, परम्परा, कला बोध पर विमर्श होते आ रहे हैं, किन्तु घुमन्तू समुदायों और उनकी संस्कृति पर न के बराबर अध्ययन उपलब्ध है।
घुमन्तू समुदायों पर अध्ययन इतना सरल है भी नहीं। इसका अध्ययन एक चुनौती की तरह है। यह सुखद है कि भारतीय मेधा इस ओर उन्मुख हुई है। घुमन्तू समुदायों की उपस्थिति विश्व भर में है। भारत के पहाड़ों और चारागाहों से लेकर ग्राम्य जीवन तक इनका लोकवृत्त मिलता है। आधुनिकता और भौतिक विकास से लगभग असंपृक्त रहे इन समुदायों की परम्पराएँ आज भी जीवंत है। इसी को ध्यान में रखते हुए अकादमी की ओर से तीन दिवसीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है। जिसके पहले दिन 19 अक्टूबर, मंगलवार को उद्भव और स्थिति, रीति-रिवाज और संस्कृति विषय पर शोधार्थियों एवं अध्येताओं द्वारा शोध पत्रों का वाचन एवं पत्रों का प्रस्तुतिकरण किया जयेगा। दूसरे दिन 20 अक्टूबर, बुधवार को देवी-देवता, पर्व-त्योहार और आस्थाएँ तथा समाजिक संगठन विषय एवं 21 अक्टूबर, गुरूवार को मौखिक साहित्य, प्रदर्शनकारी एवं रूपंकर कलाएँ (नृत्य, नाट्य, गायन, वादन एवं अन्य) विषयों पर अध्येता, शोधार्थियों द्वारा शोध पत्र प्रस्तुत किए जायेंगे। संगोष्ठी का समन्वय बरकतुल्ला विश्वविद्यालय के समाज विज्ञान की अधिष्ठाता डॉ. रूचि घोष दस्तिदार एवं शासकीय हमीदिया कला एवं वाणिज्य हाविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. अल्पना त्रिवेदी द्वारा किया जा रहा है।
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